व्यापार-व्यवसाय की दृष्टि से शनि का मकर राशि में गोचर

Saturn Transit
जिनके कॅरिअर में अवसर मौजूद हों, वे ग्रहगोचर एवं दशाओं से अधिक प्रभावित होते हैं। इस सम्बन्ध में शनि का गोचर सर्वाधिक प्रमुख रूप से प्रभावित करता है। कॅरिअर की दृष्टि से देखें तो व्यापार-व्यवसाय में सर्वाधिक अवसर होते हैं। यह अवसर दोनों ही प्रकार के होते हैं। दॉंव उलटा पड़ जाए, तो खोने के अवसर भी बहुत होते हैं। यदि सीधा पड़ जाए, तो पाने के भी अवसर बहुत होते हैं। यह मानकर चलें कि जिन्होंने कुछ ही समय में सफलता की चोटी छू ली हो, उसमें शनि या राहु का विशेष योगदान होता है। इसी प्रकार जो कुछ ही समय में व्यवसाय के साम्राज्य से धरातल पर आ गिरे हों, उसमें भी इन दोनों ग्रहों में से किसी एक की विशेष भूमिका होती है। इस प्रकार शनि का गोचर में राशि परिवर्तन व्यवसायियों को सर्वाधिक रूप से प्रभावित करता है। आइए, देखते हैं, शनि का मकर राशि में प्रवेश उनके व्यवसाय को किस रूप में प्रभावित करेगा?
मेष राशि

मेष राशि के व्यवसासियों के लिए शनि का मकर राशि में गोचर उनकी जन्मराशि से दशम भाव में रहेगा। चन्द्रकुण्डली के दशम भाव में स्थित शनि की दृष्टि से द्वादश भाव, चतुर्थ भाव एवं सप्तम भाव मुख्यरूप से प्रभावित होंगे। दशमस्थ शनि के फलस्वरूप आपके स्वयं के शारीरिक परिश्रम में वृद्धि होगी। ऐसे कार्य हाथ में लेने पड़ेंगे, जिनमें मजदूरों एवं अन्य व्यक्तियों से सीधा सम्बन्ध रहेगा। लेबर ओरिएंटेड वर्क में अधिक सफलता मिल पाएगी। यहॉं स्थित शनि कठोर परिश्रम की अपेक्षा कर रहा है। जितना आप इससे दूर होंगे, उतना ही शनि बाधा उत्पन्न करेगा। इसलिए कठोर परिश्रमी होना ही दशमस्थ शनि के गोचर की दृष्टि से अनुकूल रहेगा।
द्वादश भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप इस गोचरावधि में खर्चों में वृद्धि होगी। शत्रु एवं प्रतिस्पर्धियों के कारण समस्याएँ उत्पन्न होंगी। व्यवसाय की आन्तरिक समस्याएँ भी उभरकर सामने आएँगी। सरकारी निर्णयों के कारण खर्चों एवं टैक्स में वृद्धि हो सकती है। टैक्स आदि के सम्बन्ध में लापरवाही न करें अन्यथा आर्थिक शास्ती (दण्ड) के भी योग हैं।
दशमस्थ शनि की चतुर्थ भाव पर दृष्टि के फलस्वरूप घरेलू कारणों से व्यवसाय में परेशानियॉं उत्पन्न हो सकती हैं। दूसरी ओर व्यावसायिक व्यस्तता के चलते घरेलू समस्याएँ भी उत्पन्न हो सकती हैं। दोनों ही प्रकार की स्थितियॉं घर की शान्ति एवं सुख को कम करने वाली होंगी। स्थायी सम्पत्ति के सम्बन्ध में विवाद उत्पन्न हो सकते हैंै अथवा उनके सम्बन्ध में कोई चिन्ता परेशान कर सकती है। कर्मचारियों के साथ आपके सम्बन्ध तनावपूर्ण हो सकते हैं। उनके आपसी सम्बन्ध भी प्रभावित हो सकते हैं।
सप्तम के प्रभावित होने से जीवनसाथी की सक्रियता व्यवसाय में देखने को मिल सकती है, वहीं दूसरी ओर साझेदारों एवं स्थायी सप्लायरों-ग्राहकों के साथ सामंजस्य में कुछ परेशानी का अनुभव हो सकता है। इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। धनाभाव के कारण आपकी व्यावसायिक योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
नई योजनाओं के चलते मन्दी के प्रभाव से कुछ हद तक दूर हो पाने में आप सफल होंगे। भाग्य का यद्यपि बहुत साथ नहीं मिल पाएगा। फिर भी विगत गोचरावधि की तुलना में यह मकर का शनि आपके लिए न केवल राहतकारी वरन् अनुकूल फलदायक भी रहना चाहिए।
उपाय : 1. सातमुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
2. ‘ॐ शं शनैश्‍चराय नम:।’ मन्त्र का यथासम्भव जप करना चाहिए।
3. घर के बुजुर्ग सदस्यों के चरण स्पर्श कर प्रतिदिन आशीर्वाद लेना चाहिए।
4. रोगियों एवं वृद्धों की सेवा करनी चाहिए।
5. अपनी कमरे, घर, बाथरूम आदि की स्वयं सफाई करनी चाहिए।
6. शारीरिक परिश्रम की मात्रा में वृद्धि करें।•

वृषभ राशि

वृषभ राशि के व्यवसायियों के लिए मकर राशि में शनि का गोचर उनकी जन्मराशि से नवम भाव में रहेगा। नवम भाव में शनि का गोचर सामान्यत: शुभ नहीं माना जाता, परन्तु वृषभ राशि वालों के लिए यह इस दृष्टि से राहतकारी सिद्ध होगा, क्योंकि वे अष्टम ढैया से अब मुक्त होंगे। इस प्रकार विगत गोचरावधि में जो ढैयाजनित अशुभफल उन्हें व्यवसाय में मिल रहे थे, उनमें भारी कमी आएगी। व्यवसाय में मन्दी से सम्बन्धित समस्याओं में राहत मिलेगी। फँसी हुई उधार का भुगतान भी होने लगेगा, जिससे आर्थिक स्थिति में भी राहत मिलेगी। ॠण आदि की समस्या भी काफी हद तक दूर होगी। साझेदारों आदि से सम्बन्धों में सुधार होगा।
नवमस्थ शनि के फलस्वरूप वृषभ राशि की चन्द्रकुण्डली में नवम, एकादश, तृतीय एवं षष्ठ भाव प्रभावित होंगे। नवम भाव में शनि के स्थित होने पर यद्यपि भाग्य का पूरा साथ नहीं मिलता, परन्तु व्यक्ति के लालच में कमी आती है और वह अपेक्षाकृत अधिक सन्तोषी स्वभाव रखता है, जिसके फलस्वरूप वह अधिक लाभ के लिए जोखिमपूर्ण निवेश या कार्य नहीं करता। जो चल रहा है, उसे ही चलाने का प्रयत्न करता है। कुछ हद तक वैराग्य एवं परोपकार की भावना भी उत्पन्न होती है, जिसके मौद्रिक लाभ-हानि के दृष्टिकोण से दूर होने लगता है।
एकादश भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप आय में बाधा उत्पन्न होती है। आय में कमी का अनुभव होता है। तृतीय एवं एकादश पर गोचरस्थ शनि की दृष्टि आर्थिक कारणों से सहोदरों से मतभेद उत्पन्न कर सकती है। उनके अपेक्षित सहयोग की प्राप्ति सम्भव न होगी। स्थायी सम्पत्ति आदि के व्यय के भी योग बन रहे हैं।
वृषभ लग्न की चन्द्रकुण्डली में नवम भाव में गोचरस्थ शनि की षष्ठ भाव पर पूर्ण दृष्टि होती है, जिसके फलस्वरूप इस गोचरावधि में ॠण आदि के चुकने की स्थितियॉं बनती हैं, मुकदमे अथवा सरकारी विभागों में चल रहे मामलों में राहत मिलती है। यद्यपि इस सम्बन्ध में भाग-दौड़ अधिक होती है, परन्तु उसके स्वरूप सकारात्मक परिणाम भी प्राप्त होता है। यह भी देखा गया है कि व्यवसायी व्यवसाय छोड़कर नौकरी की ओर उन्मुख होते हैं। प्राय: ऐसा अल्पपूँजी वाले व्यवसायियों के साथ देखने को मिलता है।
उपाय : 1. पॉंच कैरेट अथवा उससे अधिक वजन का नीलम मध्यमा अंगुली में धारण करना चाहिए।
2. ॐ शं शनैश्‍चराय नम:। मन्त्र का यथासम्भव जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव की पूजा-उपासना करनी चाहिए।
4. आध्यात्मिक गुरु का अधिकाधिक अशीर्वाद प्राप्त करें।
5. साधु-सन्तों की सेवा करें।
6. इस गोचरावधि में प्रतिवर्ष एक तीर्थयात्रा अवश्य करें।•

मिथुन राशि

मिथुन राशि के व्यवसायियों के लिए मकर राशि में शनि का गोचर उनकी जन्मराशि से अष्टम भाव में रहेगा। अष्टम भाव में शनि का गोचर सामान्यत: शुभफलप्रद नहीं होता। इसके फलस्वरूप एक ओर जहॉं व्यापार में मन्दी का सामना करना पड़ सकता है, वहीं दूसरी ओर लाभ में कमी अथवा घाटा होने की आशंका रहेगी।
जन्मराशि से अष्टम, भाव में शनि का गोचर ‘शनि की ढैया’ संज्ञक होता है। व्यवसाय सहित सभी क्षेत्रों में सतर्कता की अपेक्षा रखता है। मिथुन राशि की चन्द्र कुण्डली में मकर का शनि अष्टम दशम, द्वितीय एवं पंचम भाव को प्रभावित करता है। इन्हीं से ही सम्बन्धित गोचरीय फल प्राप्त होते हैं। अष्टम में स्थित होकर शनि बिक्री में कमी, आय-लाभ में कमी, लेनदारी-देनदारी दोनों में ही वृद्धि, ॠणभार में वृद्धि, हानि, दुर्घटना, करभार में वृद्धि इत्यादि का कारण बन सकता है। यदि दशाएँ भी अशुभ हों, तो यह ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर देता है, जिसमें व्यवसाय बदलने अथवा छोड़ने की परिस्थितियॉं भी बन जाती हैं। दूसरी ओर यह ऐसे अवसर भी उत्पन्न करता है, जिसके माध्यम से विदेशी व्यापार अथवा विदेशी कम्पनियों से व्यापार-व्यवसाय का जुड़ाव आरम्भ होता है।
अष्टमस्थ शनि की दशम भाव पर तृतीय दृष्टि होती है, जिसके फलस्वरूप कर्मठता में कमी का अनुभव होता है। आलस्य की अधिकता रहती है और कार्यों को टालने की प्रवृत्ति का जन्म होता है। जो व्यक्ति अपने पिता के साथ व्यवसाय में संलग्न हैं अथवा किसी पैतृक व्यवसाय में संलग्न हैं, वे उससे दूर होने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे फलों की आशंका मकरस्थ शनि के गोचर के दौरान हो रही है।
वृषभ राशि के लिए शनि की अष्टम ढैया के फलस्वरूप संचित धन में कमी का अनुभव होता है। कुटुम्बियों एवं प्रतिस्पर्धियों से शत्रुता बनती है। साथ ही साझेदारी एवं स्थायी सप्लायरों-ग्राहकों आदि से परेशानी का अनुभव होता है।
अष्टम भाव में गोचर कर रहे शनि की मिथुन राशि की चन्द्र कुण्डली में पंचम पर पूर्ण दृष्टि होती है, जिसके फलस्वरूप मुकदमेबाजी में वृद्धि होती है। सरकारी मामलों से परेशानी होती है और ॠण लेने की परिस्थितियॉं बनती हैं। ॠणभार में भी वृद्धि होती है।
उपाय : 1. सातमुखी रुद्राक्ष सोमवार अथवा किसी शुभमुहूर्त में गले में धारण करना चाहिए।
2. ‘ॐ प्रां प्रीं प्रों स: शनये नम:।’ मन्त्र का यथासम्भव जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं हनूमान् जी की पूजा-उपासना करनी चाहिए।
4. महामृत्युंजय मन्त्र का अधिकाधिक बार जप करना चाहिए।
5. गौशाला, वृद्धाश्रम आदि में श्रमदान एवं धनदान करना चाहिए।•

कर्क राशि

कर्क राशि के व्यवसायियों के लिए शनि का मकर राशि में गोचर उनकी जन्मराशि से सप्तम भाव में रहेगा। जन्मराशि से सप्तम भाव में शनि का गोचर सामान्यत: मिश्रित फलदायक रहता है। यद्यपि इस गोचरावधि में विशेष परिवर्तन की उम्मीद नहीं है, परन्तु लाभ में वृद्धिदर अथवा व्यवसाय में उन्नति की दर कुछ कम होती हुई दिखाई देगी। व्यवसाय विस्तार की योजनाएँ तो बन सकती हैं, परन्तु उनका क्रियान्वयन अपेक्षानुरूप न होे पाने का मलाल रहेगा।
मकर राशि में शनि के गोचर के दौरान कर्क राशि की चन्द्रकुण्डली में सप्तम, नवम, लग्न एवं चतुर्थ भाव मुख्यत: प्रभावित होगा। सप्तम भाव में शनि के स्थित होने के फलस्वरूप साझेदार से सम्बन्ध कुछ कटु हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त आपके प्रमुख सप्लायरों अथवा ग्राहकों से भी कुछ अनबन हो सकती है। सरकारी निर्णयों के कारण भी आपका व्यवसाय अथवा लाभ प्रभावित हो सकता है।
नवम भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप भाग्य का अपेक्षानुरूप सहयोग न मिल पाने की स्थिति बनेगी, जिसके फलस्वरूप कार्यों में अपेक्षानुरूप सफलता नहीं मिल पाएगी। ऐन वक्त पर बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। अवसरों का अपेक्षानुरूप लाभ उठा पाने में आप सफल नहीं होंगे। इसके अतिरिक्त पिता के साथ यदि आप व्यवसाय कर रहे हैं, तो उससे अलग होने की परिस्थितियॉं बन सकती हैं। पैतृक व्यवसाय से सभी आप मुक्त होना चाहेंगे।
सप्तम भाव में शनि के गोचर के फलस्वरूप आलस्य में वृद्धि होती है और कार्यों को टालने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। उद्यम एवं पहल करने की प्रवृत्ति में कमी आएगी। जो चल रहा है, उसे चलाए रखने की प्रवृत्ति ही बनेगी। नए प्रयास करने की प्रवृत्ति में कमी का अनुभव होगा।
शनि की चतुर्थ भाव पर दृष्टि के फलस्वरूप आप कृषि आदि क्षेत्रों में निवेश अथवा उसकी ओर उन्मुख हो सकते हैं। अपने मूल निवास स्थान से सम्बन्धित व्यवसायों में भी संलग्न हो सकते हैं।
उपाय : 1. सातमुखी रुद्राक्ष सोमवार अथवा किसी शुभ मुहूर्त में धारण करें।
2. ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:।’ मन्त्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं माता पार्वती की पूजा-उपासना करनी चाहिए।
4. शनिवार का व्रत करना चाहिए।•

सिंह राशि

सिंह राशि के व्यवसायियों के लिए शनि का मकर राशि में गोचर उनकी जन्मराशि से षष्ठ भाव में रहेगा। जन्मराशि से षष्ठ भाव में शनि का गोचर सामान्यत: शुभफलदायक रहता है। इस शुभ गोचर के फलस्वरूप व्यवसाय में चल रही बाधाएँ दूर होंगी। व्यवसाय विस्तार की योजनाएँ बनेंगी और उनका क्रियान्वयन भी सम्भव होगा। व्यापार में उन्नति की तथा धनलाभ में वृद्धि की दर तुलनात्मक रूप से अधिक होगी। सरकारी निर्णय से लाभ भी होगा।
सिंह राशि की चन्द्रकुण्डली में मकरस्थ शनि अपनी गोचरावधि के दौरान न केवल षष्ठ भाव को, वरन् अष्टम, द्वादश एवं तृतीय भाव को प्रभावित करेगा। षष्ठ भाव में शनि के स्थित होने के फलस्वरूप ॠणभार में कमी होती है। अटकी हुई उधार की प्राप्त सम्भव होगी। साथ ही, मुकदमे एवं सरकारी निर्णयों में भी राहत मिलेगी। व्यवसाय में कार्यरत कर्मचारी आदि से अपेक्षानुरूप सहयोग की प्राप्ति सम्भव होगी। चन्द्रकुण्डली के अष्टम भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप एक ओर जहॉं विदेश अथवा विदशी कम्पनियों से सम्बन्धित व्यवसाय-व्यापार के अवसर मिल सकते हैं, वहीं दूसरी ओर नई खोज, नए प्रोडक्ट, कॉपीराइट अथवा पेटेंट सम्बन्धी मामलों में आपके पक्ष में स्थितियॉं बनेंगी अथवा इस क्षेत्र से लाभ होगा। नवीन क्षेत्रों में व्यवसाय की स्थितियॉं बन सकती हैं। इसके अतिरिक्त वसीयत आदि से प्राप्त होने वाली सम्पत्ति से सम्बन्धित मामले उलझ सकते हैं, उनमें बाधा का सामना करना पड़ सकता है।
द्वादश भाव पर शनि की दृष्टि यद्यपि बहुत अनुकूल नहीं है, खर्चों में वृद्धिकारक है, परन्तु इस गोचरावधि में शनि की जब-जब गुरु के साथ युति रहेगी, तब-तब सैद्धान्तिक सुदृढ़ता बढ़ेगी और खर्चों में कमी आएगी। टैक्स आदि से सम्बन्धित मामले सुलझेंगे, जिससे राहत का अनुभव होगा।
षष्ठ भावस्थ शनि की चन्द्रकुण्डली के तृतीय भाव पर दृष्टि के फलस्वरूप उद्यम एवं साहस में वृद्धि होगी। उत्साह एवं पराक्रम बढ़ा-चढ़ा रहेगा। पहल करने की क्षमता बढ़ेगी। कठोर परिश्रम एवं दृढ़ निश्‍चय से व्यावसाय में अपेक्षानुरूप प्रगति सम्भव होगी।
उपाय : 1. सातमुखी रुद्राक्ष किसी शुभमुहूर्त में धारण करना चाहिए।
2. ‘ॐ शं शनैश्‍चराय नम:’ मन्त्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं हनूमान् जी की पूजा-उपासना करनी चाहिए।
4. वर्ष में दो बार तीर्थयात्रा करें।•

कन्या राशि

कन्या राशि वाले व्यवसायियों के लिए मकर राशि में शनि का गोचर उनकी जन्मराशि से पंचम भाव में रहेगा। जन्मराशि से पंचम भाव में शनि का गोचर सामान्यत: शुभफलदायक नहीं माना जाता। यह गोचरावधि सतर्कता वाली है। व्यवसाय विस्तार इन दिनों करना ठीक नहीं है। साथ ही, जोखिमपूर्ण धन निवेश भी नहीं करना चाहिए। अधिक उधार आदि देने से भी बचना चाहिए।
जन्मराशि से पंचम भाव में शनि का गोचर ‘कण्टक’ संज्ञक माना गया है। यह न केवल पंचम भाव को वरन् सप्तम, एकादश एवं द्वितीय भाव को भी प्रभावित करता है। कन्या लग्न की चन्द्रकुण्डली में पंचम भाव में गोचररत शनि व्यवसाय में वित्तीय संकट के लिए उत्तरदायी होता है। अर्थाभाव के कारण व्यापार विस्तार की योजनाएँ सफल नहीं हो पातीं। इसके अतिरिक्त गलत निर्णयों के कारण भारी आर्थिक हानि उठानी पड़ सकती है। लालच या अधिक लाभ की उम्मीद में इस प्रकार के गलत निर्णय हो सकते हैं। इस सम्बन्ध में सावधान रहने की आवश्यकता है। परिश्रम पर विश्‍वास करें। आकस्मिक धनलाभ की स्थिति इस गोचरावधि में नहीं है।
चन्द्रकुण्डली के सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप साझेदार अथवा प्रमुख सप्लायर या ग्राहकों से सम्बन्धों में तनाव हो सकता है। सरकारी निर्णय भी व्यवसाय की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।
एकादश भाव पर शनि की दृष्टि आय प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करती है। भुगतान आदि के अटकने की स्थितियॉं बन सकती हैं। उधार आदि देते समय सावधानी रखने की आवश्यकता है, वहीं दूसरी ओर ऐसे कार्य करने से बचना चाहिए, जहॉं भुगतान प्राप्ति का संकट हो। कार्यों में अपेक्षित सफलताएँ प्राप्त न होने से मन परेशान हो सकता है। ऐन मौके पर कार्य रुक सकते हैं।
द्वितीय भाव पर शनि की दृष्टि एक ओर जहॉं संचित धन में कमी का संकेत करती है, वहीं दूसरी ओर कुटुम्बीजनों से अपेक्षित सहयोग न मिल पाने का भी संकेत करती है। कौटुम्बिक सम्पत्ति सम्बन्धी विवाद की ओर भी संकेत कर रही है। कार्यों की सफलता में बाधा भी उत्पन्न करती है।
उपाय : 1. सातमुखी रुद्राक्ष सोमवार अथवा किसी शुभमुहूर्त में गले में धारण करना चाहिए।
2. ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:’ मन्त्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं हनूमान् की नित्य पूजा-उपासना करनी चाहिए।
4. बुजुर्ग एवं रोगियों की सेवा करना लाभदायक रहेगा।
5. पुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए।•

तुला राशि

तुला राशि के व्यवसायियों के लिए मकर राशि में शनि का गोचर उनकी जन्मराशि से चतुर्थ भाव में रहेगा, जो कि ढैया संज्ञक है। जन्मराशि से चतुर्थ भाव में शनि का गोचर व्यवसाय की दृष्टि से अशुभफलदायक है। व्यावसायिक बाधाएँ कुछ हद तक परेशान कर सकती हैं, परन्तु नवीन क्षेत्रों में व्यवसाय विस्तार की योजनाएँ अधिक प्रगति नहीं कर पाएँगी, जिससे अधिक निराशा होगी। लाभ की वृद्धिदर में कमी की आशंका रहेगी। आकस्मिक बाधाएँ परेशान कर सकती हैं। अन्य कार्यों में व्यस्तताओं के चलते भी व्यवसाय प्रभावित हो सकता है।
जन्मराशि से चतुर्थ भाव में शनि का गोचर तुला राशि की चन्द्रकुण्डली में न केवल चतुर्थ भाव को, वरन् षष्ठ, दशम एवं लग्न को भी प्रभावित करता है। चतुर्थ भाव में स्थित शनि व्यावसायिक अस्थिरता प्रदान करता है। आर्थिक संकट उत्पन्न होता है। यह संकट एक ओर जहॉं आय में कमी के फलस्वरूप होता है, वहीं दूसरी ओर खर्चों में भारी वृद्धि या आकस्मिक खर्चे-हानि के कारण होता है। यदि परिजनों के साथ व्यवसाय कर रहे हैं, तो उनके साथ मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में भी व्यवसाय को संकट उत्पन्न होता है। स्थायी सम्पत्ति सम्बन्धी विवाद उत्पन्न होते हैं। निवेश से भी अपेक्षित लाभ की प्राप्ति नहीं हो पाती।
षष्ठ भाव पर दृष्टि के फलस्वरूप इस गोचरावधि में ॠणभार में वृद्धि हो सकती है। नए ॠण आदि लेने की स्थितियॉं भी बन सकती हैं। इस दौरान वाद-विवाद एवं मुकदमेबाजी में भी वृद्धि हो सकती है। इस सम्बन्ध में सावधानी रखें। सरकारी नियमों एवं कानूनों का उल्लंघन न करें, अन्यथा परेशानी हो सकती है। सरकारी विभागों में मामले अटक सकते हैं। साथ ही सरकारी निर्णयों से बाधा उत्पन्न हो सकती है।
दशम भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप व्यवसाय में शारीरिक परिश्रम की अधिकता हो सकती है। इसके अतिरिक्त लेबर ओरिएंटेड बिजनस की ओर झुकाव हो सकता है। लग्न पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप आलस्य में वृद्धि हो सकती है, साथ ही कार्यों को टालने की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है। नकारात्मक विचारों की अधिकता हो सकती है। इस सम्बन्ध में सावधान रहें।
उपाय : 1. पॉंच कैरेट अथवा उससे अधिक वजन का नीलम धारण करना चाहिए।
2. ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:। मन्त्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं माता पार्वती की पूजा करनी चाहिए।
4. माता-पिता के चरण स्पर्श करें।
5. सम्भव हो सके, तो शनिवार का व्रत करना चाहिए।•

वृश्‍चिक राशि

वृश्‍चिक राशि के व्यवसायियों के लिए शनि का मकर राशि में गोचर उनकी जन्मराशि से तृतीय भाव में रहेगा। तृतीय भाव में शनि का गोचर सामान्यत: शुभफलदायक रहता है। इस गोचरावधि में व्यवसायियों को व्यवसाय विस्तार के अवसर मिलेंगे। धनलाभ में वृद्धि होगी। साथ ही, साझेदारों आदि से भी पर्याप्त सहयोग प्राप्त होगा। धन निवेश की दृष्टि से भी समय उपयुक्त है।
जन्मराशि से तृतीय भाव में शनि का गोचर चन्द्रकुण्डली के न केवल तृतीय भाव को, वरन् पंचम, नवम एवं द्वादश भाव को भी प्रभावित करता है। उपचय भाव तृतीय में शनि की उपस्थिति उत्साह एवं पराक्रम में वृद्धि करती है। व्यवसाय के लिए आवश्यक उद्यमशीलता एवं कर्मठता में वृद्धि होगी। दृढ़निश्‍चय एवं पहल करने की प्रवृत्ति के चलते नए अवसर प्राप्त होंगे और उनका समुचित लाभ उठा पाने में सफल होंगे। सरकार एवं राजनीतिक साधनों से व्यावसायिक लाभ की प्राप्ति की दृष्टि से भी समय अनुकूल है। इस क्षेत्र में अवसर मिल सकते हैं। स्थायी सम्पत्ति में वृद्धि के अवसर भी आएँगे। साथ ही पूर्व में किए गए धन निवेश से बेहतर प्रतिफल की प्राप्ति भी सम्भव होगी। पूर्व में जो उधार आदि अटकी हुई थी, उसकी प्राप्ति के भी योग बन रहे हैं।
नवम भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप समाज सेवा, धर्म, तीर्थोद्धार एवं अन्य परोपकार से सम्बन्धित कार्यों में सक्रियता बढ़ेगी। द्वादश भाव पर शनि की दृष्टि से उक्त कार्यों में दान एवं खर्चे की स्थितियॉं बनेंगी। इसके अतिरिक्त विदेशी कम्पनियों से व्यापार अथवा विदेश में व्यापार के अवसर भी प्राप्त हो सकते हैं।
उपाय : 1. सातमुखी रुद्राक्ष धारण किसी शुभमुहूर्त में धारण करें।
2. ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:।’ मन्त्र का जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं माता पार्वती की पूजा-उपासना करनी चाहिए।
4. शनिवार का व्रत करना चाहिए।
5. दीपावली अथवा अन्य किसी अमावस्या के दिन कुल देवता के स्थान पर जाकर दीपक जलाना चाहिए।•

धनु राशि

धनु राशि वाले व्यवसायियों के लिए शनि का मकर राशि में गोचर उनकी जन्मराशि से द्वितीय भाव में रहेगा। द्वितीय भाव में शनि का गोचर सामान्यत: शुभफलदायक नहीं माना जाता। यह ‘उतरती साढ़ेसाती’ के रूप में होता है, इसलिए व्यवसासियों के लिए शनि का यह गोचर विगत गोचरावधि की तुलना में बेहतर व्यतीत होना चाहिए। व्यवसाय में आ रही बाधाएँ काफी हद तक दूर होंगी और विस्तार की योजनाएँ भी बनेंगी।
द्वितीय भाव में स्थित शनि चतुर्थ, अष्टम एवं एकादश भाव को प्रभावित करता है। इस गोचरावधि के दौरान साढ़ेसाती के दुष्प्रभावों में कुछ हद तक कमी आएगी और बेहतरी के कई अवसर प्राप्त होने की उम्मीद की जा सकती है। व्यवसाय के टर्नओवर में वृद्धि होगी, आमदनी भी बढ़ेगी। साथ ही, आकस्मिक खर्चों पर भी नियन्त्रण होगा, जिसके फलस्वरूप व्यवसाय के लाभ में वृद्धि होगी।
चन्द्रकुण्डली में चतुर्थ भाव पर दृष्टि के फलस्वरूप स्थायी सम्पत्ति से सम्बन्धित कतिपय विवाद उभर सकते हैं, वहीं दूसरी ओर इस प्रकार की सम्पत्ति से किराया, लीज आदि से नियमित आय भी प्राप्त होने के योग बन रहे हैं। इसके अतिरिक्त खान-खनिज आदि से सम्बन्धित यदि आपका व्यवसाय है, तो उसमें भी लाभ के योग बनेंगे। हॉं, पैतृक व्यवसाय के सम्बन्ध में विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
अष्टम भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप विदेश व्यापार अथवा विदेशी कम्पनियों के साथ व्यवसाय, एजेंसी इत्यादि के अवसर मिल सकते हैं। इस सम्बन्ध में आप प्रयास कर सकते हैंै और आपके लिए यह लाभप्रद भी रहेगा। ले-देकर कार्य निबटाने की प्रवृत्ति भी बनेगी।
एकादश भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप अपने परिश्रम एवं योजनाओं से आय में वृद्धि सम्भव होगी। अटके हुए धन की भी प्राप्ति होने से आर्थिक संकट दूर होगा तथा व्यवसाय में धन निवेश की स्थितियॉं बनेंगी, जिससे अपेक्षानुरूप प्रतिफल की प्राप्ति सम्भव होगी। कार्यों में आ रही बाधाएँ दूर होंगी और उनमें सफलता प्राप्त होने लगेगी। इस सकारात्मक प्रवृत्ति से उत्साह एवं पराक्रम में वृद्धि होगी।
उपाय : 1. सातमुखी रुद्राक्ष सोमवार अथवा किसी शुभमुहूर्त में धारण करना चाहिए।
2. ‘ॐ शं शनैश्‍चराय नम:’ मन्त्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं हनूमान् जी की पूजा-उपासना करनी चाहिए।
5. वर्ष में दो बार तीर्थयात्रा करें।•

मकर राशि

मकर राशि के व्यवसायियों के लिए शनि का उनकी जन्मराशि के ऊपर से गोचर सामान्यत: अनुकूल फलदायक नहीं है। यह मध्य की साढ़ेसाती है, जो कि व्यवसाय में सतर्कता की अपेक्षा रखती है। व्यवसाय में जो चल रहा है, उसे ही चलाने का प्रयत्न करें। नया कुछ करने के लिए उपयुक्त समय नहीं है। आलस्य की प्रवृत्ति बढ़ सकती है, साथ ही कार्यों को टालने की प्रवृत्ति भी बढ़ेगी। इस प्रकार की प्रवृत्ति पर नियन्त्रण लगाने का प्रयत्न करें। व्यवसाय परिवर्तन अथवा बन्द कर नौकरी करने का मानस भी बन सकता है। इस सम्बन्ध में जल्दबाजी में निर्णय न लें। सोच-समझकर एवं दूसरों से सलाह-मशविरा करके निर्णय लेना ही उचित रहेगा।
चन्द्रकुण्डली के तृतीय भाव पर दृष्टि के फलस्वरूप उत्साह एवं पराक्रम में कमी आती है तथा नकारात्मक विचारों में वृद्धि होती है। कार्यों को टालने की प्रवृत्ति बढ़ती है। चन्द्रकुण्डली के सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि के फलस्वरूप साझेदारों, ग्राहकों एवं सप्लायरों से सम्बन्धों में तनाव हो सकता है, इसलिए इनसे अच्छे सम्बन्ध रखने का प्रयास करें। इसी प्रकार उधार आदि भी अधिक न दें, अन्यथा इसके डूबने की आशंका है। ॠण आदि लेने में भी सतर्कता रखें। अनुत्पादक ॠणों से बचें तथा अत्यावश्यक होने पर ही ॠण लें। अभी आपका समय कुछ ऐसा चल रहा है, जिसके कारण ॠण के कुचक्र में आप फँस सकते हैं।
कर्म भाव पर शनि की दृष्टि के कारण परिश्रम के अनुुरूप सफलता प्राप्त नहीं होती। कार्यों में बाधाएँ आती हैं तथा मित्रों एवं निकट सम्बन्धियों से अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं होता। सरकारी निर्णयों से बाधा उत्पन्न होती है और व्यवसाय की गतिविधियॉं प्रभावित होती हैं। इसलिए इस सम्बन्ध में भी सावधानी रखने की आवश्यकता है।
उपाय : 1. पॉंच कैरेट वजन का नीलम रत्न धारण करना चाहिए।
2. ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:’ मन्त्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं हनूमान् की नित्य पूजा-उपासना करनी चाहिए।
4. बुजुर्ग एवं रोगियों की सेवा करना लाभदायक रहेगा।
5. पुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए।•

कुम्भ राशि

कुम्भ राशि के व्यवसायियों के लिए शनि का मकर राशि में गोचर उनकी जन्मराशि से द्वादश भाव में रहेगा। शनि का द्वादश भाव में गोचर साढ़ेसाती के आरम्भ का द्योतक है। व्यवसायियों के लिए साढ़ेसाती का आरम्भ आकस्मिक कारणों से व्यवसाय में बाधा एवं लाभ में कमी करवाता है। इसलिए इन क्षेत्रों में आपको विशेष सावधानी रखने की आवश्यकता है। व्यावसायिक मन्दी एवं धनाभाव के चलते व्यवसाय बदलने की भी सोच सकते हैं। व्यापार विस्तार की दृष्टि से अभी समय उपयुक्त नहीं है।
द्वादश भाव में शनि अनेक प्रकार की बाधाएँ उत्पन्न करता है। एक ओर जहॉं व्यवसाय के टर्नओवर में कमी आती है, वहीं दूसरी ओर चोरी, दुर्घटना, कार्मिक असन्तोष, शत्रुता, सरकारी निर्णय आर्थिक दण्ड, बीमारी इत्यादि के कारण व्यावसायिकहित गम्भीर रूप से प्रभावित होते हैं। व्यवसाय स्थल के परिवर्तन की भी स्थितियॉं बनती हैं।
द्वादश भाव में स्थित शनि चन्द्रकुण्डली में द्वितीय भाव पर अपनी पूर्ण दृष्टि रखता है, जिसके फलस्वरूप कार्यों में सफलता में बाधा आती है। व्यवसाय के संसाधनों में कमी होती है। संचित धन भी खर्च करना पड़ सकता है। परिजनों आदि से अपेक्षित सहयोग की प्राप्ति नहीं होती।
द्वादश भाव में गोचर कर रहे शनि के फलस्वरूप षष्ठ भाव भी प्रभावित होता है, जिसके परिणामस्वरूप शत्रुओं की संख्या में वृद्धि होती है। मुकदमेबाजी होती है तथा कानूनी विवाद परेशान करते हैं। ॠण आदि लेने की भी परिस्थितियॉं बन जाती है। दी गई उधार अटक जाती है और देनदारियॉं बढ़ जाती हैं।
साढ़ेसाती के आरम्भ में गोचरस्थ शनि की दशम दृष्टि नवम भाव पर रहती है, जिसके चलते भाग्य का अपेक्षित सहयोग प्राप्त नहीं हो पाता। पैतृक व्यवसाय में अपेक्षित प्रगति नहीं होती तथा उससे दूर होने की परिस्थितियॉं भी बन जाती हैं।
उपाय : 1. पॉंच कैरेट वजन का नीलम धारण करना चाहिए।
2. ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:। मन्त्र का अधिकाधिक जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव एवं माता पार्वती की पूजा करनी चाहिए।
4. माता-पिता के चरण स्पर्श करें।
5. सम्भव हो सके, तो शनिवार का व्रत करना चाहिए।•

मीन राशि

मीन राशि के व्यवसायियों के लिए शनि का मकर राशि में गोचर उनकी जन्मराशि से एकादश भाव में रहेगा। जन्मराशि से एकादश भाव में शनि का गोचर सामान्यत: शुभफलप्रद रहता है। व्यवसाय विस्तार की योजनाएँ बनेंगी। साथ ही, पूर्व में चली आ रही बाधाएँ भी समाप्त होंगी। अटके हुए भुगतान प्राप्त होंगे और ॠणादि का भी चुकारा सम्भव होगा। सरकारी निर्णय से लाभ होने की सम्भावना है।
एकादश भावस्थ शनि कार्यों में सफलता प्रदान करता है। किए गए प्रयासों का प्रतिफल अपेक्षानुरूप प्राप्त होने के योग हैं। इसके अतिरिक्त व्यवसाय में अनेक नए अवसर मिल सकते हैं और उनसे लाभ उठाने की परिस्थितियॉं भी बन सकती हैं। मित्रों एवं परिजनों का अपेक्षित सहयोग प्राप्त होगा। इसके अतिरिक्त भाग्य का भी साथ मिलेगा। बहुप्रतीक्षित कार्यों के पूर्ण होने से हर्ष का अनुभव होगा। यदि भुगतान आदि अटका हुआ है, तो उसकी प्राप्ति के भी योग बन रहे हैं। ऐसे अवसरों का लाभ उठाएँ। सरकारी निर्णयों से भी लाभ होने के योग हैं।
एकादश भाव में गोचररत शनि अपनी तृतीय पूर्ण दृष्टि से जन्मराशि को भी देखेगा, जिसके फलस्वरूप उत्साह एवं पराक्रम में वृद्धि होगी। दृढ़ निश्‍चय एवं कार्य करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी तथा पहल करने की क्षमता में भी वृद्धि होगी। नकारात्मक विचार दूर होंगे और आगे बढ़ने का जोश बढ़ेगा। इन सब सकारात्मक परिवर्तनों से व्यवसाय में बेहतरी के लक्षण दिखेंगे।
पंचम भाव पर पूर्ण दृष्टि के फलस्वरूप व्यवसाय की ब्रांडिंग इमेज में वृद्धि होगी। प्रतिष्ठा बढ़ेगी तथा पुरस्कार आदि की प्राप्ति के भी योग बढ़ेंगे। साथ ही लाभ में वृद्धि की दर भी बढ़ेगी। पूर्व में किए गए निवेश से धनलाभ होगा। एकादश भाव में स्थित शनि अपनी दशम पूर्ण दृष्टि से अष्टम भाव को देखेगा, जिसके फलस्वरूप विदेशी व्यापार के अवसर मिल सकते हैं। इसके अलावा विदेशी कम्पनियों से व्यवसाय अथवा उनकी एजेंसियॉं प्राप्त करने के भी अवसर आ सकते हैं। अपने शहर से बाहर व्यवसाय करने के भी अवसर मिल सकते हैं। ऑनलाइन आदि से बेहतर परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। वसीयत आदि से भी लाभ प्राप्ति के योग बन रहे हैं। इस प्रकार मीन राशि के व्यवसायियों के लिए शनि का यह गोचर शुभफलदायक, लाभ में वृद्धिकारक, मान एवं प्रतिष्ठा को स्थापित करने वाला, सफलताप्रद तथा व्यवसाय को नवीन ऊँचाइयॉं देने वाला सिद्ध हो सकता है।
उपाय : 1. सातमुखी रुद्राक्ष सोमवार अथवा किसी शुभमुहूर्त में धारण करें।
2. ‘ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:।’ मन्त्र का यथाशक्ति जप करना चाहिए।
3. भगवान् शिव की पूजा-उपासना करनी चाहिए।
4. शनिवार का व्रत करना चाहिए।
5. अपने कुल देवता के स्थान पर जाकर दीपावली अथवा अन्य किसी अमावस्या के दिन दीपक जलाना चाहिए।•