नवम्‍बर, 2018 के व्रत-पर्व

व्रत-पर्व
रमा एकादशी व्रत (03 एवं 04 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी ‘रमा एकादशी’ के नाम से जानी जाती है| इस वर्ष यह 03 एवं 04 अक्टूबर को पड़ रही है| इस दिन सविधि एकादशी व्रत किया जाता है और सायंकाल में रमा एकादशी व्रत की कथा का श्रवण किया जाता है| इस दिन तुलसी पूजा का विशेष महत्त्व है|
व्रत-कथा
द्वापर युग की बात है| भगवान् श्रीकृष्ण की अनेक रानियॉं थीं, उनमें सत्यभामा भी एक थी| उसे रूपमती होने का घमण्ड था| वह सोचा करती थी कि उसके रूप के कारण ही श्रीकृष्ण उससे प्रेम करते हैं| एक बार नारद जी श्रीकृष्ण के महल में पधारे, तो सत्यभामा ने नारद जी से कहा कि ऐसा आशीर्वाद दीजिए, जिससे कि अगले जन्म में भी श्रीकृष्ण मुझे पतिरूप में प्राप्त हों| इस पर नारद जी बोले ‘नियम यह है कि जिस वस्तु को इस जन्म में दान किया जाता है, तो अगले जन्म में वह वस्तु उसे प्राप्त होती है| यदि तुम श्रीकृष्ण को दान कर दो, तो अगले जन्म में श्रीकृष्ण तुम्हें पति के रूप में प्राप्त हो जाएँगे|’ सत्यभामा ने नारद जी को श्रीकृष्ण दान में दे दिए| नारद जी जब दान में प्राप्त श्रीकृष्ण को अपने साथ स्वर्ग में ले जाने लगे, तो अन्य रानियों ने उनका रास्ता रोक लिया और कहने लगीं कि हमारा सुहाग हमें वापस दे दो, इस पर नारद जी ने कहा कि ‘एक शर्त पर श्रीकृष्ण को वापस दे सकता हूँ| यदि तुम इनके वजन के बराबर सोना एवं रत्न दे दो, तो मैं इन्हें तुम्हें वापस दे दूँगा|’ नारदजी के इन वचनों को सुनकर उनकी सभी रानियों ने एक तुला लगवा दी और उसमें एक ओर श्रीकृष्ण बैठ गए और दूसरी ओर के पलड़े में उन रानियों ने अपने-अपने आभूषण-रत्नादि रखना आरम्भ किया| उन्होंने अपने समस्त रत्न-आभूषण तुला के पलड़े में रख दिए, किन्तु पलड़ा झुका ही नहीं| रानियॉं बड़ी परेशान हुईं| रुक्मिणी को जब इसका समाचार मिला, तो वे तुलसी पूजा करने के उपरान्त नारद जी के समीप आयीं और उन्होंने तुलसी पूजा से प्राप्त तुलसीदल को तराजू के दूसरे पलड़े में रख दिया| तुलसीदल के प्रताप से तराजू का पलड़ा झुक गया और तुला का वजन बराबर हो गया| नारद जी ने दान में लिए हुए श्रीकृष्ण को रुक्मिणी को सौंप दिया और तुलसीदल को लेकर स्वर्ग चले गए| इस प्रकार तुलसी माता के प्रताप से ही रुक्मिणी एवं अन्य रानियों का सुहाग वापस आया|


गोवत्स द्वादशी (04 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की द्वादशी गोवत्स द्वादशी के नाम से जानी जाती है| इस दिन गाय-बछड़े की पूजा की जाती है| महिलाओं को इस दिन व्रत करना चाहिए तथा एक समय भोजन करना चाहिए| भोजन में गाय के दूध या उससे बने हुए पदार्थ तथा तेल में पके हुए पदार्थ नहीं खाने चाहिए| सायंकाल जब गाय चरकर वापस आएँ, तो बछड़े सहित गन्ध, पुष्प, अक्षत, दीप आदि से पूजन करना चाहिए और उड़द के बड़ों का भोग लगाना चाहिए| इसके पश्‍चात् गौ माता को प्रणाम करके निम्नलिखित प्रार्थना करनी चाहिए :
‘सर्वदेवमये देवि सर्वदेवैरलंकृते| मातर्ममाभिलषितं सफलं कुरु नन्दिनि॥
अन्त में निम्नलिखित कथा का श्रवण करना चाहिए|
व्रत-कथा
सतयुग की बात है, महर्षि भृगु के आश्रम में भगवान् शंकर के दर्शन प्राप्त करने के लिए अनेक मुनि तपस्या कर रहे थे| एक दिन शिव, पार्वती और कार्तिकेय स्वयं उन मुनियों को दर्शन देने के लिए क्रमश: बूढ़े ब्राह्मण, गाय एवं बछड़े के वेश में उस आश्रम में आए| बूढ़े ब्राह्मण का वेश धरे भगवान् शिव ने महर्षि भृगु को कहा कि ‘हे मुनि! मैं यहॉं स्नान करके जम्बूक्षेत्र में जाऊँगा और दो दिन बाद लौटूँगा, तब तक आप इस गाय और बछड़े की रक्षा करना|’ भृगु सहित अन्य मुनियों से जब गाय और बछड़े की रक्षा का आश्‍वासन मिल गया तो भगवान् शिव वहॉं से चल दिए| थोड़ी दूर चलकर उन्होंने बाघ का वेश रख लिया और पुन: आश्रम आ गए और गाय तथा बछड़े को डराने लगे| ॠषिगण भी बाघ को देखकर डरने लगे, किन्तु वे गाय एवं बछड़े की रक्षा के प्रयास भी कर रहे थे, अन्त में उन्होंने ब्रह्मा से प्राप्त भयंकर आवाज करने वाले घण्टे को बजाना आरम्भ किया| घण्टे की आवाज सुनकर बाघ अदृश्य हो गया और भगवान् शिव अपने सही रूप में प्रकट हो गए| पार्वती जी तथा कार्तिकेयजी भी अपने सही रूप में प्रकट हो गए| ॠषियों ने उनकी पूजा की| चूँकि उस दिन कार्तिक मास की द्वादशी थी, इसलिए यह व्रत गोवत्स द्वादशी के रूप में आरम्भ हुआ|


प्रदोष व्रत (05 एवं 20 नवम्बर, 2018)
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05 नवम्बर को सोमप्रदोष है एवं 20 नवम्बर को भौमप्रदोष व्रत है| इस दिन प्रात: संकल्प लेकर व्रत करना चाहिए तथा भगवान् शिव का जलाभिषेक रुद्रमन्त्रों के साथ करना चाहिए| प्रदोषकाल में शिवताण्डव स्तोत्र का पाठ करना चाहिए तथा रात्रिजागरण करना चाहिए|


श्री धनवन्तरि जयन्ती (05 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को आयुर्वेद के जन्मदाता भगवान् धन्वन्तरि का प्राकट्‌य हुआ था| उनका प्राकट्‌य समुद्र मन्थन के दौरान हुआ था| इसी कारण कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धन्वन्तरि जयन्ती के रूप में भी मनाया जाता है| इस दिन भगवान् धनवन्तरि की पूजा की जाती है और उनसे आरोग्य की कामना की जाती है|


धनत्रयोदशी (05 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक मास की कृष्णपक्ष की त्रयोदशी धनत्रयोदशी के रूप में जानी जाती है| इसी दिन चॉंदी के बर्तन खरीदने का विधान है| सायंकाल में यमराज के निमित्त दीपदान किया जाता है| इस दीपदान से असामयिक मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है|


हनूमान् जयन्ती (05 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी हनूमान् जयन्ती के रूप में भी मनायी जाती है| हनूमान् जी का प्राकट्‌य कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी मंगलवार को अर्द्धरात्रि में अंजनादेवी के उदर से हुआ था| इस दिन हनूमान् भक्तों को प्रात:काल स्नानादि करके हनूमान् जी की व्रत-उपासना का संकल्प लेना चाहिए| तदुपरान्त हनूमान् जी का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए| पूजन के पश्‍चात् हनूमान् जी के विग्रह पर सिन्दूर चढ़ाना चाहिए| तदुपरान्त पुरुष नाम के पुष्प जैसे; हजारा, गुल हजारा आदि चढ़ाने चाहिए तथा प्रसाद के रूप में चूरमा, केला, अमरूद आदि चढ़ाना चाहिए| उसके पश्‍चात् सुन्दरकाण्ड का पाठ करना चाहिए| इस दिन केवल एक समय बिना नमक का भोजन करना चाहिए|


रूपचतुर्दशी (06 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी रूप चतुर्दशी एवं नरक चतुर्दशी के नाम से जानी जाती है| इस दिन प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व शरीर पर तेल लगाकर उबटनों से स्नान करना चाहिए और नए वस्त्र धारण करने चाहिए| तदुपरान्त यम-तर्पण करना चाहिए| सायंकाल यमराज के निमित्त दीपदान करना चाहिए|


दीपावली (07 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक कृष्ण अमावस्या को दीपावली मनायी जाती है| ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान् श्री राम 14 वर्ष के वनवास एवं लंका पर विजय के उपरान्त अयोध्या लौटे थे| इस अवसर पर अयोध्यावासियों ने घरों में दीपक जलाकर रोशनी करके स्वागत किया था, तब से यह पर्व प्रकाश पर्व के रूप में और दीपावली के रूप में मनाया जाता है| इस वर्ष सायंकाल में कार्तिक कृष्ण अमावस्या 07 नवम्बर, 2018 को पड़ रही है| इस दिन घर की साफ-सफाई करके सायंकाल दीपदान करना चाहिए| दीपदान के लिए एक थाली में सरसों के तेल के 26 दीपक रखें तथा उनके मध्य में एक चौमुखा दीपक रखकर उन्हें प्रज्वलित करें, तदुपरान्त उनका रोली, अक्षत और पुष्प से पूजन करें तथा निम्नलिखित मंत्र का उच्चारण अवश्य करें :
भो दीप त्वं ब्रह्मरूप अन्धकारनिवारक|
इमां मया कृतां पूजां गृह्णँस्तेज: प्रवर्धय॥

अब दीपकों को घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर, तुलसीजी के समीप, रसोई, पूजास्थल, अध्ययन कक्ष, पेयजल रखने के स्थान पर, ब्रह्मस्थल (घर का आँगन अथवा चौक), घर की छत पर और स्थानीय परम्परानुसार वांछित स्थलों पर दीपदान करें|


श्रीमहालक्ष्मी पूजन दिवस (07 नवम्बर, 2018)
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दीपावली का पर्व महालक्ष्मी पूजा के लिए विशेष पर्व है| ब्रह्मपुराण में लिखा है कि दीपावली को अर्द्धरात्रि के समय महालक्ष्मी सद् गृहस्थों के घर में जहॉं-तहॉं विचरण करती हैं| इसलिए इस दिन अपने घर को सभी प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध और सुशोभित करके दीपावली तथा दीपमालिका मनाने से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और वहॉं निवास करती हैं| इस पर्व पर सायंकाल में शुभ चौघड़िया एवं स्थिर लग्न में महालक्ष्मी की पूजा की जाती है| इस प्रकार के शुभ मुहूर्त ज्योतिष सागर के प्रस्तुत अंक में प्रमुख शहरों के लिए दिए गए हैं| उनका आप अवलोकन कर सकते हैं|
महालक्ष्मी का पूजन कुल की रीति-रिवाज के अनुसार किया जाता है| सामान्यत: इसमें लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा या पाने को एक पाटे पर रखकर पूजा जाता है, साथ में द्रव्य लक्ष्मी अर्थात् चॉंदी के सिक्के आदि का पूजन भी किया जाता है| महालक्ष्मी पूजा में श्रीयन्त्र, कुबेर यन्त्र, कनकधारा यन्त्र, बीसा यन्त्र, दक्षिणावर्ती शंख, एकाक्षी नारियल आदि का पूजन करना श्रेयस्कर रहता है| दीपावली जागरण का त्योहार है| इस दिन रात्रि में गोपालसहस्रनाम स्तोत्र, विष्णुसहस्रनाम स्तोत्र, श्रीसूक्त, पुरुषसूक्त, लक्ष्मीसहस्रनाम स्तोत्र, सिद्धलक्ष्मी स्तोत्र, लक्ष्मी कवच, लक्ष्मी चालीसा, महालक्ष्मी के विविध मंत्र, लक्ष्मीगायत्री आदि का पठन एवं जप किया जाता है| दीपदान में रखे गए चौमुखा दीपक को महालक्ष्मी के पूजा कक्ष में रखना चाहिए और उसे रातभर प्रज्वलित रखना चाहिए|


महाकाली पूजा (07 नवम्बर, 2018)
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07 नवम्बर, 2018 को महाकाली पूजा का भी पर्व है| इस दिन माता काली का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए| काली पूजा से अन्य मनोकामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ शत्रुविजय, मुकदमे में विजय, प्रतिस्पर्धा में विजय, तांत्रिक अभिचार कर्मों से मुक्ति, भय से मुक्ति, अदृश्य बाधाओं से मुक्ति जैसे शुभ फल भी प्राप्त होते हैं|


कमला जयन्ती (07 नवम्बर, 2018)
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समुद्रमन्थन के दौरान कार्तिक कृष्ण अमावस्या को माता कमला का प्रादुर्भाव हुआ| इसी कारण इस दिन को कमला जयन्ती के रूप में भी मनाया जाता है|


महावीर निर्वाण दिवस (07 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक कृष्ण अमावस्या के दिन महावीर स्वामी का निर्वाण (देहावसान) हुआ था| वे जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे| पार्श्‍वनाथ के पश्‍चात् ये दूसरे ऐतिहासिक तीर्थंकर हैं| ये जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक माने जाते हैं| महावीर स्वामी का जन्म वैशाली के निकट वज्जिसंघ के कुण्डग्राम (बिहार) के विख्यात ज्ञातृक क्षत्रिय सरदार सिद्धार्थ (श्रेयांश या यसाम्स) के यहॉं 599 ई.पू. (540 ई.पू. या 618 ई.पू.) में हुआ था| उनकी माता का नाम त्रिशला (प्रियकारिणी या विदेहदत्ता) था| महावीर स्वामी के एक बड़ा भाई और बहन थी| उनका बचपन का नाम वर्द्धमान था| वे जाति से क्षत्रिय थे| उनकी पत्नी का नाम यशोदा था| यशोदा से प्रियदर्शना (अणोज्जा) नामक एक पुत्री उत्पन्न हुई थी|
30 वर्ष की अवस्था में अपने पिता की मृत्यु के उपरान्त महावीर स्वामी ने अपने बड़े भाई की अनुमति लेकर गृह त्याग दिया और संन्यास धारण कर लिया| सच्चे ज्ञान की खोज में 13 वर्ष तक भटकने के पश्‍चात् जम्भीय ग्राम (जम्भीका) के निकट उज्जुवालिया (ॠजुपालिका) नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे लगभग 43 वर्ष की अवस्था में वैशाख दशमी को उन्हें ‘कैवल्य’ (ज्ञान) की प्राप्ति हुई| ‘केवल ज्ञान’ की प्राप्ति के पश्‍चात् महावीर स्वामी ने अपने मत का प्रचार-प्रसार किया| उन्होंने प्राकृत भाषा में उपदेश दिए|
72 वर्ष की आयु में महावीर स्वामी का बिहार स्थित राजगृह के समीप पावापुरी में मल्लराजा सस्तीपाल के महलों में 527 ई.पू. (468 ई.पू. या 546 ई.पू.) में निर्वाण हुआ था| कतिपय विद्वानों के अनुसार, महावीर स्वामी का देहांत उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले में पडरोना अथवा फाजिलपुर नामक स्थान पर हुआ था|


अन्नकूट (08 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को अन्नकूट का उत्सव भी मनाया जाता है| इस दिन खरीफ फसलों से प्राप्त अनाज एवं नई सब्जियों को बनाकर भगवान् विष्णु का भोग लगाया जाता है| ऐसा करने से भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं :
कार्तिकस्य सिते पक्षे अन्नकूटं समाचरेत्‌|
गोवर्धनोत्सवं चैव श्रीविष्णु: प्रीयतामिति॥


गोवर्धन पूजा (08 नवम्बर, 2018)
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कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पर्व मनाया जाता है| जैसा कि नाम से स्पष्ट है यह पर्व गोपालन के संवर्द्धन के लिए है| इस दिन भगवान् श्रीकृष्ण, गाय और बैलों का पूजन करना चाहिए| सायंकाल में गोबर से गोवर्धन की लेटी हुई प्रतिमा का निर्माण किया जाता है और उसका पूजन किया जाता है| पूजन में निम्नलिखित मन्त्र का अवश्य उच्चारण करें :
गोवर्धन धराधार गोकुलत्राणकारक|
विष्णुवाहकृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥

अर्थात् पृथ्वी को धारण करने वाले गोवर्धन आप गोकुल के रक्षक हैं| भगवान् श्रीकृष्ण ने आपको अपनी भुजाओं पर उठाया था, आप मुझे करोड़ों गौएँ प्रदान करें|


चित्रगुप्त पूजा (09 नवम्बर, 2018)

कार्तिक शुक्ल द्वितीया को भगवान् चित्रगुप्त का भी पूजन किया जाता है| यह पर्व भारत की प्रमुख जाति कायस्थ के लिए विशेष पर्व है| वैसे तो सभी के लिए चित्रगुप्त आराध्य और पूजनीय हैं, किन्तु कायस्थ जाति के लिए ये विशेष रूप से पूजनीय हैं|


यमद्वितीया (09 नवम्बर, 2018)

कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया को यमद्वितीया के रूप में मनाया जाता है| इस दिन यमुना स्नान एवं यम पूजन किया जाता है| यमुना पूजन में निम्नलिखित मंत्र से प्रार्थना करें :
यमस्वसर्नमस्तेऽस्तु यमुने लोकपूजिते|
वरदा भव में नित्यं सूर्यपुत्रि नमोऽस्तु ते॥

यमराज की पूजा के दौरान निम्नलिखित मंत्र से प्रार्थना करें :
धर्मराज नमस्तुभ्यं नमस्ते यमुनाग्रज|
पाहि मां किङ्करै: सार्धं सूर्यपुत्र नमोऽस्तु ते॥

तदुपरान्त शंख (दक्षिणावर्ती टाईगर शंख हो, तो श्रेयस्कर) अथवा ताम्रपात्र में शुद्ध जल लेकर उसमें रोली, अक्षत, पुष्प आदि डालकर निम्नलिखित मन्त्र से यमराज को अर्घ्य देना चाहिए :
एह्येहि मार्तण्डज पाशहस्त यमान्तकालोकधरामरेश|
भ्रातृद्वितीयाकृतदेवपूजां गृहाण चार्घ्यं भगवन्नमस्ते॥

ज्ञातव्य रहे कि यमुना और यमराज दोनों भाई-बहन हैं| दोनों ही सूर्य के पुत्र हैं| यमपूजा से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है और उपासक दीर्घायु प्राप्त करता है|


भाईदूज (09 नवम्बर, 2018)

कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया को भाईदूज मनायी जाती है| इस दिन बहिन के घर पर भाई द्वारा भोजन किया जाता है और बहिन भाई के तिलक करती है| तिलक के उपरान्त भाई अपनी बहिन को यथासामर्थ्य उपहार देता है| बहिन इसके बदले अपने भाई को शुभाशीष देती है और भगवान् से उसके लिए शुभकामनाएँ करती है| रक्षाबंधन के पश्‍चात् भाईदूज बहिन-भाई के प्रेम का विशेष पर्व है|
कथा
यम और यमुना भगवान् सूर्य की संतान हैं| दोनों भाई-बहिनों में अतिशय प्रेम था, परन्तु यमराज यमलोक की शासन-व्यवस्था में इतने व्यस्त रहते कि यमुनाजी के घर ही न जा पाते| एक बार यमुनाजी यम से मिलने आयीं| बहिन को आया देख यमदेव बहुत प्रसन्न हुए और बोले — बहिन! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मुझसे जो भी वरदान मॉंगना चाहो, मॉंग लो| यमुना ने कहा — भैया! आज के दिन जो मुझमें स्नान करे, उसे यमलोक न जाना पड़े| यमराज ने कहा — बहिन! ऐसा ही होगा| उस दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया थी| इसलिए इस तिथि को यमुनास्नान का विशेष महत्त्व है|
कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि को यमुना ने अपने घर अपने भाई यम को भोजन कराया और यमलोक में बड़ा उत्सव हुआ, इसलिए इस तिथि का नाम ‘यमद्वितीया’ है, अत: इस दिन भाई को अपने घर भोजन न कर बहन के घर जाकर प्रेमपूर्वक उसके हाथ का बना हुआ भोजन करना चाहिए| इससे बल और पुष्टि की वृद्धि होती है| इसके बदले बहिन को स्वर्णालंकार, वस्त्र तथा द्रव्य आदि से संतुष्ट करना चाहिए| यदि अपनी सगी बहिन न हो, तो पिता के भाई की कन्या, मामा की पुत्री, मौसी अथवा बुआ की बेटी ये भी बहिन के समान हैं, इनके हाथ का बना भोजन करें| जो पुरुष यमद्वितीया को बहिन के हाथ का भोजन करता है, उसे धन, यश, आयुष्य, धर्म, अर्थ और अपरिमित सुख की प्राप्ति होती है|


त्रिदिवसीय सूर्यषष्ठी व्रत (11 से 13 नवम्बर, 2018)

सूर्यषष्ठी प्रमुख रूप से भगवान् सूर्य का व्रत है| यह व्रत बिहार में सर्वाधिक प्रचलित है| इस व्रत में भगवान् सूर्य की पूजा की जाती है| इस व्रत में अस्तगामी एवं उदयगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और उसकी पूजा की जाती है| इस व्रत का प्रसाद मॉंगकर खाने का विधान है| स्कन्दपुराण के अनुसार कार्तिक शुक्ल पंचमी को एक बार भोजन करना चाहिए, तदुपरान्त षष्ठी के दिन प्रात:काल व्रत का संकल्प लेते हुए पूरे दिन निराहार रहना चाहिए| वाक् संयम रखना चाहिए| फिर किसी नदी के किनारे जाकर फल, पुष्प, घृत पक्व नैवेद्य, धूप, दीप आदि से भगवान् सूर्य का पूजन करना चाहिए| रक्त चन्दन और रक्त पुष्प भगवान् सूर्य की पूूजा में विशेष रूप से रखने चाहिए| अन्त में ताम्रपात्र में शुद्ध जल लेकर उसमें रोली, पुष्प, अक्षत डालकर उस जल से भगवान् सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए|
सूर्यषष्ठी के व्रत में आटे और गुड़ से युक्त ‘ठेकुआ’ विशेष रूप से बनाए जाते हैं| ठेकुआ पर लकड़ी के सॉंचे से भगवान् सूर्य के रथ के चक्र को अंकित किया जाता है| सूर्य भगवान् के साथ-साथ इस दिन माता षष्ठी की भी पूजा की जाती है| षष्ठी देवी की प्रतिमा बनाकर उसका पूजन किया जाता है| उदयगामी अर्घ्य के पश्‍चात् उनका विसर्जन किया जाता है| ऐसा माना जाता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में माता षष्ठी का आगमन हो जाता है| सूर्यषष्ठी का व्रत अन्य मनोकामनाओं की पूर्ति के साथ-साथ पुत्र कामना के लिए भी किया जाता है|
व्रत-कथा
एक वृद्धा के कोई सन्तान नहीं थी| कार्तिक शुक्ल सप्तमी के दिन उसने संकल्प किया कि यदि उसके पुत्र होगा तो वह व्रत करेगी| सूर्य भगवान् की कृपा से वह पुत्रवती तो हुई, पर उसने व्रत नहीं किया|
लड़के का विवाह हो गया| विवाह से लौटते समय वर-वधू ने एक जंगल में डेरा डाल लिया| तब वधू ने वहॉं पालकी में अपने पति को मरा पाया| वह विलाप करने लगी| उसका विलाप सुनकर एक वृद्धा उसके पास आकर बोली, ‘‘मैं छठ माता हूँ| तुम्हारी सास सदैव मुझे फुसलाती रही है| उसने संकल्प करके भी मेरी पूजा एवं व्रत नहीं किया, किन्तु तुम्हारा विलाप देखकर मैं तुम्हारे पति को जीवित कर देती हूँ| घर जाकर अपनी सास से इस विषय में बात करना|’’ वर जीवित हो उठा| वधू ने घर जाकर सास से सारी वार्ता कही| सास ने भूल स्वीकार कर ली और उस दिन के बाद से सूर्यषष्ठी का व्रत करने लगी|


गोपाष्टमी (16 नवम्बर, 2018)

कार्तिक शुक्ल अष्टमी गोपाष्टमी के रूप में मनायी जाती है| ऐसा माना जाता है कि गोपाष्टमी भगवान् श्रीकृष्ण के समय से ही मनायी जाती है| इन्द्र के प्रकोप से गोप-गोपियों और गायों को बचाने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण ने कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से अष्टमी तक गोवर्धन पर्वत को धारण किए रहे| अन्त में इन्द्र ने अपने अहंकार को त्यागकर भगवान् श्रीकृष्ण से क्षमा प्रार्थना की| इस उपलक्ष्य में ब्रज में उत्सव मनाया गया है, जो बाद में गोपाष्टमी के नाम से मनाया जाने लगा| इस दिन गाय, गोवत्स (बछड़े) तथा गोपालों के पूजन का विधान है| शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति इस दिन गायों को ग्रास खिलाए और उनकी सेवा करें तथा सायंकाल में गायों का पंचोपचार से पूजा करे, तो व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं| आधुनिक युग में यदि हम गोपाष्टमी पर गौशाला के लिए दान करें और गायों की रक्षा के लिए प्रयत्न करें, तो गोपाष्टमी का कृत्य पूर्ण होता है और उसका पुण्य प्राप्त किया जा सकता है|


आँवला नवमी (17 नवम्बर, 2018)

कार्तिक शुक्ल नवमी को आँवला नवमी के रूप में मनाया जाता है| इस दिन व्रत रखा जाता है और आँवले के वृक्ष का पूजन किया जाता है| यह ‘कूष्माण्ड नवमी’ या ‘अक्षय नवमी’ और ‘धात्री नवमी’ के रूप में भी मनायी जाती है|


अक्षय कूष्माण्ड नवमी (17 नवम्बर, 2018)

कार्तिक शुक्ल नवमी को अक्षय कूष्माण्ड नवमी के रूप में मनाया जाता है| इस दिन प्रात:काल व्रत का संकल्प लिया जाना चाहिए| तदुपरान्त स्नान-ध्यान आदि करने के पश्‍चात् आँवले के वृक्ष के नीचे पूर्वाभिमुख बैठकर ‘ॐ धात्र्यै नम:’ मन्त्र से षोडशोपचार पूजन करके निम्नलिखित मन्त्रों से आँवले के वृक्ष की जड़ में दूध की धारा गिराते हुए पितरों का तर्पण करें :
पिता पितामहाश्चानये अपुत्रा ये च गोत्रिण:|
ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेऽक्षयं पय:॥
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवा:|
ते पिबन्तु मया दत्तं धात्रीमूलेऽक्षयं पय:॥

इसके बाद आँवले के वृक्ष के तने में निम्नलिखित मन्त्र से सूत्र बॉंधें :
दामोदरनिवासायै धात्र्यै देव्यै नमो नम:|
सूत्रेणानेन बध्नामि धात्रि देवि नमोऽस्तु ते॥

इसके बाद कर्पूर या घृतपूर्ण दीप से आँवले के वृक्ष की आरती करें तथा निम्न मन्त्र से उसकी प्रदक्षिणा करें :
यानि कानि च पापनि जन्मान्तरकृतानि च|
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥

इसके अनन्तर आँवले के वृक्ष के नीचे ब्राह्मण-भोजन भी करवाना चाहिए और अन्त में स्वयं भी आँवले के वृक्ष के सन्निकट बैठकर भोजन करना चाहिए| एक पका हुआ कुम्हड़ा (कूष्माण्ड) लेकर उसके अन्दर रत्न सुवर्ण, रजत या रुपया आदि रखकर निम्न संकल्प करें :
ममाखिलपापक्षयपूर्वकसुखसौभाग्यदीनामुत्तरोत्तराभिवृद्धये कूष्माण्ड दानमहं करिष्ये|
तदन्तर विद्वान् तथा सदाचारी ब्राह्मण को तिलक करके दक्षिणासहित कूष्माण्ड दे दें और निम्न प्रार्थना करें :
कूष्माण्डं बहुबीजाढ्यं ब्रह्मणा निर्मितं पुरा|
दास्यामि विष्णवे तुभ्यं पितॄणां तारणाय च॥

पितरों के शीतनिवारण के लिए यथाशक्ति कम्बल आदि ऊर्णवस् (ऊनीवस्त्र) भी सत्पात्र ब्राह्मण को देना चाहिए|


भीष्मपंचक व्रत प्रारम्भ (19 से 23 नवम्बर, 2018)

यह व्रत कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी से आरम्भ होकर पूर्णिमा तक किया जाता है| पॉंच दिनों के इस व्रत को भीष्म ने भगवान् वासुदेव से प्राप्त किया था| प्रथम दिन पॉंच दिन के व्रत का संकल्प लिया जाता है और देवताओं, ॠषियों और पितरों को श्रद्धा सहित याद किया जाता है| इस व्रत में लक्ष्मीनारायणजी की मूर्ति बनाकर उनका पूजन किया जाता है| वैसे तो पूजन षोडशोपचार होता है, किन्तु इसमें प्रथम दिन भगवान् के हृदय का कमल पुष्पों से, दूसरे दिन कटि प्रदेश का बिल्वपत्रों से, तीसरे दिन घुटनों का केतकी पुष्पों से, चौथे दिन चरणों का चमेली पुष्पों से और पॉंचवे दिन सम्पूर्ण अंग का तुलसी की मंजरी से पूजन किया जाता है| व्रती को प्रतिदिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मन्त्र का यथा संभव जप करना चाहिए तथा अंतिम दिन हवन करना चाहिए| इस व्रत में सामर्थ्यानुसार निराहार, फलाहार, एकभुक्त, मिताहार या नक्तव्रत करना चाहिए| इस व्रत में पंचगव्य पान की विशेष महिमा है| व्रत के अन्त में ब्राह्मण दम्पती को भोजन कराना चाहिए|


देवप्रबोधनी एकादशी (19 नवम्बर, 2018)

कार्तिक शुक्ल एकादशी देव प्रबोधिनी एकादशी के रूप में मनायी जाती है| इस दिन भगवान् विष्णु चारमास शयन के पश्‍चात् जागते हैं| इस सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है, कि भगवान् विष्णु ने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को शंखासुर नामक राक्षस को परास्त किया| उसकी थकान मिटाने के लिए भगवान् विष्णु क्षीरसागर में जाकर चार मास तक सोते रहे और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागे| इस दिन उपवास करने का विशेष महत्त्व है| यदि उपवास संभव न हो, तो एक समय फलाहार कर लेना चाहिए| रात्रि में भगवान् विष्णु की षोडशोपचार पूजा के पश्‍चात् घण्टा, शंख, मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि के साथ निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए प्रभु से जागने की प्रार्थना करें :
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पते|
त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्‌॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे|
हिरण्याक्षप्राणघातिन् त्रैलोक्ये मङ्गलं कुरु॥

इसके बाद भगवान् विष्णु की आरती करें तथा पुष्पांजलि अर्पण करके निम्नलिखित मन्त्रों से प्रार्थना करें :
इदं तु द्वादशी देव प्रबोधाय विनिर्मिता|
त्वयैव सर्वलोकानां हितार्थं शेषयानि|
इदं व्रतं मया देव कृतं प्रीत्यै तव प्रभो|
न्यूनं सम्पूर्णतांयातु त्वत्प्रसादाज्जनार्दन॥
इस व्रत में रात्रि जागरण किया जाना चाहिए|


तुलसी विवाह (19 नवम्बर, 2018)

कार्तिक शुक्ल एकादशी को तुलसी विवाह का उत्सव मनाया जाता है| इस दिन तुलसी जी और शालग्राम जी का विवाह किया जाता है| तुलसी के वृक्ष एवं उसके गमले को विविध प्रकार से सजाया जाता है और तुलसी का सुहागिन की भॉंति शृंगार किया जाता है, तदुपरान्त शालग्रामजी का पूजन किया जाता है और शालग्रामजी को सिंहासन सहित हाथ में लेकर तुलसी की सात परिक्रमा करवायी जाती है| अन्त में आरती की जाती है| विवाह के मंगल गीत गाए जाते हैं|


वैकुण्ठ चतुर्दशी व्रत (22 नवम्बर, 2018)

कार्तिक मास की शुक्लपक्ष की चतुर्दशी वैकुण्ठ चतुर्दशी के नाम से जानी जाती है| इस दिन स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए| तदुपरान्त भगवान् विष्णु की कमल पुष्पों से पूजा करनी चाहिए, तत्पश्‍चात् भगवान् शंकर की पूजा की जानी चाहिए| यह व्रत वैष्णवों के साथ-साथ शैव मतानुयायियों द्वारा भी किया जाता है|
व्रत-कथा
एक बार भगवान् विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आये| यहॉं मणिकर्णकाघाट पर स्नान करके उन्होंने एक हजार स्वर्ण कमलपुष्पोें से भगवान् विश्‍वनाथ के पूजन का संकल्प किया| अभिषेक के बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिवजी ने उनकी भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक कमलपुष्प कम कर दिया| भगवान् श्रीहरि को अपने संकल्प की पूर्ति के लिए एक हजार कमल पुष्प चढ़ाने थे| एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा मेरी आँखें कमल के ही समान हैं, इसीलिए मुझे ‘कमलनयन’ और ‘पुण्डरीकाक्ष’ कहा जाता है| एक कमल के स्थान पर मैं अपनी आँख ही चढ़ा देता हूँ — ऐसा सोचकर वे अपनी कमलसदृश आँख चढ़ाने को उद्यत हो गए| भगवान् विष्णु की इस अगाध भक्ति से प्रसन्न हो देवाधिदेव महादेव प्रकट होकर बोले — हे विष्णो! तुम्हारे समान संसार में दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है| आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी, अब वैकुण्ठ चतुर्दशी के नाम से अभिहित होगी| इस दिन व्रतपूर्वक पहले आपका पूजन कर जो मेरा पूजन करेगा, उसे वैकुण्ठलोक की प्राप्ति होगी| भगवान् शिव ने विष्णु को करोड़ों सूर्यों की प्रभा के समान कान्तिमान् सुदर्शन चक्र दिया और कहा कि यह राक्षसों का अन्त करने वाला होगा| त्रैलोक्य में इसकी समता करने वाला कोई अस्त्र नहीं होगा|


कार्तिक पूर्णिमा (23 नवम्बर, 2018)

कार्तिक पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है| इस दिन सायंकाल भगवान् विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था| इस दिन व्रत, भगवान् विष्णु का पूजन एवं दान का विशेष महत्त्व है|


श्री सत्यनारायण व्रत (23 नवम्बर, 2018)

इस दिन भगवान् सत्यनारायण का पूजन एवं व्रत किया जाता है तथा भगवान् सत्यनारायण की कथा का श्रवण किया जाता है|


गुरु नानकदेव जयन्ती (23 नवम्बर, 2018)

कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को गुरु नानक जयन्ती मनायी जाती है| गुरु नानक सिख धर्म के संस्थापक हैं| इनका जन्म कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा संवत् 1526 (1469 ई.) तलवण्डी (ननकाना साहिब) में कालूचन्द पटवारी के यहॉं माता तृप्ताजी के उदर से हुआ था| गुरु नानक बचपन से ही शान्त स्वभाव के थे|
नानकजी को शिक्षा के लिए जहॉं भेजा वहीं, उन्होंने अपने शिक्षक को ही अपना शिष्य बना लिया| संवत् 1544 में इनका विवाह माता सुलक्षणा देवी के साथ हुआ|
गुरु नानकजी ने युवावस्था में 1542 से दौलत खॉं लोदी के मोदीखाने में नौकरी कर ली, लेकिन उनका ध्यान ईश्‍वर और ईश्‍वर भक्तों की ओर ही रहता था| वे सन्तों एवं दीन-दु:खियों को मोदीखाने से सामग्री दे दिया करते थे| संवत् 1554 तक उन्होंने मोदीखाने में नौकरी की, तत्पश्‍चात् उन्होंने वैराग्य ले लिया और ईश्‍वर की आराधना में लग गए| उन्होंने साम्प्रदायिक सौहार्द का उपदेश दिया| संवत् 1554 से ही उन्होंने देश की यात्राएँ की| उनकी चार यात्राएँ प्रसिद्ध हैं| पहली यात्रा में वे एमनाबाद, हरिद्वार, दिल्ली, काशी, गया, जगन्नाथपुरी आदि गए, दूसरी यात्रा में वे आबू से लेकर रामेश्‍वरम् और सिंहल द्वीप तक गए, तीसरी यात्रा में सरमौर, गढ़वाल, हेमकूट, गोरखपुर, सिक्किम, भूटान, तिब्बत आदि स्थानों पर गए तथा चौथी यात्रा उन्होंने पश्‍चिम दिशा में की और मक्का तक पहुँचे| 25 वर्ष तक भ्रमण करने के उपरान्त संवत् 1579 में करतारपुर में वे रहने लगे और वहीं 22 सितम्बर, 1539 ई. (संवत् 1596) को उन्होंने शरीर त्याग दिया| उन्होंने अपना शिष्य अंगदजी को बनाया, जो सिक्ख धर्म के दूसरे गुरु हैं|


कार्तिक स्नान समाप्त (23 नवम्बर, 2018)

कार्तिक पूर्णिमा पर कार्तिक मास के स्नान व्रत की समाप्ति होती है| इस दिन तीर्थों पर जाकर या नदी एवं अन्य पवित्र जलाशयों में स्नान का विशेष महत्त्व है| सायंकाल दीपदान किया जाता है|


अशून्यशयन व्रत (24 नवम्बर, 2018)

इस वर्ष का यह अन्तिम अशून्य शयन व्रत है| यह व्रत अखण्ड सौभाग्य के लिए किया जाता है| मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया को व्रती को भगवान् विष्णु एवं लक्ष्मीजी का पूजन करना चाहिए| सायंकाल उन्हें शय्या देकर शयन करवाना चाहिए| दूसरे दिन ब्राह्मण को भोजन करवाना चाहिए|


श्रीकालभैरवाष्टमी (29 नवम्बर, 2018)

मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी कालभैरवाष्टमी के रूप में मनायी जाती है| इस दिन भगवान् शिव ने कालभैरव के रूप में अवतार लिया था| कालभैरव भगवान् शिव का अत्यन्त रौद्र, भयानक, विकराल एवं प्रचण्ड स्वरूप है| प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए तथा भैरवजी के मंदिर में जाकर उनकी पूजा करनी चाहिए| इस दिन कुत्तों (भैरव का वाहन) को पूए खिलाने का विशेष महत्त्व है| भैरवजी को काशी का कोतवाल माना जाता है| •