जन्मपत्रिका से जानें सन्तान सुख

विवाह ज्‍योतिष

ज्योतिष शास्त्र में सन्तान सम्बन्धी विचार विशेष रूप से विचारणीय विषय है| फलित ज्योतिष की सभी विधाओं में इसका पृथक् से विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है| फलित शास्त्र की सबसे महत्त्वपूर्ण विधा जन्मपत्रिका द्वारा फलकथन में पञ्चम भाव से सन्तान विचार किया जाता है| इस भाव की सुत भाव के रूप में संज्ञा दी गई है|
आज के सन्दर्भ में जब सन्तानोत्पत्ति तथा उनकी संख्याओं का विचार करते हैं, तो पूर्व शास्त्रों में कथित योग पूर्ण रूप से फलीभूत नहीं हो पाते हैं, क्योंकि इन शास्त्रों में सन्तान सम्बन्धी सभी फल उस समय के देशकाल तथा परिस्थिति के अनुसार कहे गए हैं| उस समय एक से अधिक विवाह सामान्य बात थी तथा अधिक सन्तानोत्पत्ति पर भी कोई कानून नहीं था| चूँकि सन्तान विचार मानव जीवन से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण विषय है, अत: आज के परिप्रेक्ष्य में यह विचार कैसे किया जाए? इस विषय पर मन्थन आवश्यक है|
आज के परिप्रेक्ष्य में ज्योतिष से सन्तान विचार में मूलभूत तथ्य तो वही रहेंगे, जो कि ज्योतिष के पुरातन ग्रन्थों में थे, लेकिन उन्हें आज के अनुसार विचार करने का माध्यम पृथक् होगा|
प्राय: ज्योतिष ग्रन्थों में सन्तान विचार से सम्बन्धित योगों का निर्णय पति-पत्नी में से किसी एक की जन्मपत्रिका के आधार पर किया जाता है, लेकिन यह निर्णय कभी भी तर्कसंगत नहीं हो सकता| सन्तान विचार करते समय सर्वदा पत्नी एवं पति दोनों की ही जन्मपत्रिकाओं का अध्ययन करना चाहिए| दोनों के ही जन्मचक्रों में निम्नलिखित तथ्यों का विचार करने के पश्‍चात् ही सन्तान सम्बन्धी फल का निर्णय करना चाहिए|
1. विवाह पूर्व जन्मपत्रिका मिलान|
2. स्वयं की जन्मपत्रिका में सन्तान योग|
3. सन्तान प्राप्ति का समय|
4. गर्भाधान संस्कार का महत्त्व|
विवाह पूर्व जन्मपत्रिका मिलान
प्राय: विवाह से पूर्व जब वर-वधू की जन्मपत्रिका का मिलान किया जाता है, तो अष्टकूट तथा मङ्गली सम्बन्धी विचार तक ही यह अध्ययन सीमित रह जाता है| कई बार यह भी देखने में आता है कि श्रेष्ठ मेलापक विचार तथा मङ्गली विचार करने के पश्‍चात् भी विवाह के पश्‍चात् कई दम्पतियों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है, अत: उपर्युक्त विचार के साथ ही जन्मपत्रिका में वैवाहिक सुख, आयु तथा सन्तान सम्बन्धी फल का भी विचार अवश्य करना चाहिए| सन्तान सम्बन्धी विचार करते समय निम्नलिखित तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए :
1. वर एवं वधू दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चम तथा पञ्चमेश की स्थिति पर विचार करना चाहिए|
2. पञ्चम भाव में यदि बुध अथवा शनि में से कोई भी ग्रह बली होकर वर एवं वधू दोनों की जन्मपत्रिका में स्थित हो, तो सन्तान का अभाव रहता है|
3. वर एवं वधू दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चमेश पाप ग्रहों से पीड़ित हो तथा पञ्चम भाव को भी पाप ग्रह देखते हों, तो सन्तानोत्पत्ति का अभाव रह सकता है|
4. दोनों की ही जन्मपत्रिका में पञ्चम भाव में बली मङ्गल राहु अथवा केतु से युति करते हुए स्थित हो, तो भी सन्तान सम्बन्धी नकारात्मक फल प्राप्त होते हैं|
5. पञ्चम भाव में बली गुरु भाव मध्य में स्थित हो तथा किसी भी ग्रह से युति नहीं करे, तो सन्तान सम्बन्धी नकारात्मक फल प्राप्त होते हैं|
6. पञ्चम भाव में सूर्य विषम राशि में स्थित होकर बली हो तथा किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि पञ्चम भाव पर नहीं पड़ती हो, तो भी नकारात्मक फल ही प्राप्त होंगे|
7. पञ्चमेश बली हो अथवा शुभ ग्रहों के साथ त्रिकोणादि शुभ भावों में स्थित हो, तो सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धी शुभ फलों की प्राप्ति होती है|
8. शुभ ग्रहों के साथ बुध पञ्चम भाव में स्थित हो, तो सरलता से सन्तान प्राप्ति होती है|
9. पञ्चम भाव में कोई ग्रह नहीं हो तथा पञ्चमेश अथवा शुभ ग्रह इस भाव को देखते हों, तो भी सन्तानोत्पत्ति में किसी प्रकार की समस्या नहीं होती है|
उपर्युक्त योगों से सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धी फलों को ज्ञात किया जा सकता है| यदि नकारात्मक योग वर एवं वधू दोनों की जन्मपत्रिका में उपस्थित हों, तो ऐसा विवाह सन्तानोत्पत्ति के दृष्टिकोण से अच्छा नहीं होता है| वहीं दोनों में से किसी एक की जन्मपत्रिका में सन्तान सम्बन्धी शुभ योग होने पर थोड़े प्रयास से अथवा विलम्ब से सन्तान रत्न की प्राप्ति हो जाती है|
यदि दोनों की ही जन्मपत्रिका में शुभ योग उपस्थित हों, तो नाड़ी आदि दोष होने पर भी उत्तम सन्तान की प्राप्ति होती है|
स्वयं की जन्मपत्रिका में
सन्तान योग
किसी भी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में पञ्चम भाव अथवा पञ्चमेश ग्रह पीड़ित होने पर सन्तानोत्पत्ति में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है| यदि अत्यधिक अशुभ योग इस भाव में बनते हों साथ ही सप्तम भाव भी बुरे योगों से पीड़ित हो, तो सन्तान का ऐसे व्यक्ति के जीवन में अभाव होता है|
पञ्चम भाव से सन्तान का विचार करते समय निम्नलिखित तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए:
1. पञ्चम भाव में कौनसे ग्रह स्थित हैं?
2. यदि पञ्चमेश पञ्चम भाव में स्थित हो साथ ही वह बली भी हो तथा सप्तम भाव की स्थिति भी दृढ़ हो, तो सन्तानोत्पत्ति में किसी भी प्रकार की समस्या नहीं होती|
3. पञ्चम भाव में पाप ग्रह स्थित होने पर भी अथवा पञ्चमेश पीड़ित होने पर भी यदि शुभ ग्रह पञ्चम भाव को देखते हों तथा सप्तम एवं सप्तमेश की स्थिति भी श्रेष्ठ हो, तो कुछ विलम्ब से सन्तान सुख की प्राप्ति हो जाती है|
4. पञ्चम भाव मध्य में बिना किसी ग्रह की युति के बली गुरु, सूर्य अथवा बुध ग्रह स्थित हों, तो वह सन्तान सुख प्राप्ति में समस्या उत्पन्न करते हैं|
5. पञ्चम भाव में स्थित किसी भी प्रकार की स्थिति वाला मङ्गल यदि राहु अथवा केतु से सम्बन्ध बनाए, तो यह सन्तान सुख में कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न करता है| ऐसे व्यक्ति को बहुत प्रयासों के पश्‍चात् ही सन्तान प्राप्त होती है|
6. किसी व्यक्ति की जन्मपत्रिका में सप्तम-सप्तमेश तथा द्वितीय-द्वितीयेश की स्थिति अच्छी नहीं हो, तो पञ्चम-पञ्चमेश बली होने पर भी सन्तान प्राप्ति में कई प्रकार की समस्याएँ होती हैं|
7. पञ्चम, द्वितीय तथा सप्तम भाव पाप ग्रहों अथवा त्रिकेश ग्रहों से पीड़ित हों तथा इनके भावेशों की स्थिति भी श्रेष्ठ नहीं हो, तो कितने ही प्रयासों के बावजूद सन्तान सुख की प्राप्ति नहीं होती है|
उपर्युक्त तथ्यों का विचार करने के पश्‍चात् ही सन्तान सम्बन्धी फल का विचार करना चाहिए| यदि हम बिना द्वितीय एवं सप्तम भाव की स्थिति के ही पञ्चम भाव से सन्तान का विचार करते हैं अथवा पति या पत्नी में से किसी एक की जन्मपत्रिका से सन्तान सम्बन्धी फलों का विचार करेंगे, तो ऐसे फल में कभी सटीकता नहीं होगी|
सन्तान प्राप्ति का समय
सन्तान सम्बन्धी योगों को जानने के पश्‍चात् सन्तान प्राप्ति का समय जानना भी महत्त्वपूर्ण है| प्राय: विवाह होने के पश्‍चात् जब सन्तान प्राप्ति के योगों को देखा जाता है, तो विंशोत्तरी दशा एवं गोचर का विचार भी पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका से करना चाहिए| पञ्चम अथवा पञ्चमेश कितने ही बली क्यों नहीं हों? यदि अशुभ गोचर अथवा दशा में सन्तानोत्पत्ति होती हो, तो उसमें कई प्रकार की समस्याएँ हो सकती हैं| वहीं जन्मपत्रिका में पञ्चम-पञ्चमेश की अशुभ स्थिति होने पर भी यदि विवाह के पश्‍चात् शुभ गोचर और दशाएँ चल रही हों, तो सन्तान प्राप्ति में समस्याएँ आने पर भी उसकी प्राप्ति अवश्य हो जाती है|
पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका में यदि विवाह के पश्‍चात् केन्द्र तथा त्रिकोण भावेशों की दशा चल रही हो साथ ही गोचर में पञ्चम भाव के अन्तर्गत शुभ ग्रहों का गोचर हो रहा हो, तो सन्तान प्राप्ति में समस्याएँ नहीं होती हैं|
विवाह के पश्‍चात् त्रिकेश अथवा पाप ग्रहों की दशा हो साथ ही गोचर में पञ्चम, सप्तम तथा द्वितीय भाव में अशुभ ग्रहों का गोचर हो, विशेष रूप से पञ्चम भाव में मङ्गल, शनि, सूर्य अथवा राहु-केतु में से किन्हीं दो अथवा तीन ग्रहों का गोचर हो, अथवा ये ग्रह पञ्चम भाव को देखते हों, तो कितने ही शुभ योग होने के पश्‍चात् भी सन्तान प्राप्ति में बाधा होती है|
उपर्युक्त सन्तान प्राप्ति के समय का विचार गर्भाधान के समय विशेष रूप से करना चाहिए| इन विचारों के साथ ही गर्भाधान संस्कार का भी विशेष महत्त्व होता है|
गर्भाधान संस्कार का महत्त्व
ज्योतिष शास्त्र के मुहूर्त ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार का षोडश संस्कारों के अन्तर्गत उल्लेख प्राप्त होता है| इन ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार के लिए विशेष मुहूर्त का प्रावधान है तथा उसके लिए त्याज्य समय का भी उल्लेख है, जो इस प्रकार है|
गर्भाधान संस्कार में गण्डान्त नक्षत्र (ज्येष्ठा, रेवती, आश्‍लेषा इन नक्षत्रों की अन्तिम दो घटी तथा मूल, अश्‍विनी एवं मघा नक्षत्र की प्रारम्भिक दो घटी), जन्म नक्षत्र भरणी, ग्रहण के दिवस, व्यतिपात-वैधृति योग, माता-पिता के श्राद्ध का दिन, जन्म राशि से अष्टम लग्न, पाप ग्रह युक्त लग्न, भद्रा, रिक्ता तिथि (4, 9, 14), सन्ध्या का समय, मङ्गल-शनिवार तथा रजोदर्शन से चार रात्रियॉं त्याज्य होती हैं, वहीं उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद तथा उत्तराफाल्गुनी, मृगशिरा, हस्त, अनुराधा, रोहिणी, स्वाति, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा नक्षत्र तथा शुभ ग्रह की केन्द्र त्रिकोण में स्थिति एवं पापग्रहों की 3, 6, 11 भावों में स्थिति, सूर्य, मङ्गल तथा गुरु की लग्न पर दृष्टि तथा 6, 8, 10 आदि सम रात्रियों में गर्भाधान श्रेष्ठ होता है|
उपर्युक्त सभी तथ्यों को मिलाकर गर्भाधान का मुहूर्त निकालना बहुत ही कठिन है, अत: शुभ नक्षत्र एवं लग्न का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए, खासकर जन्मकालीन चन्द्र राशि से अष्टम भाव की राशि का लग्न एवं जिस लग्न से पञ्चम भाव में मङ्गल, सूर्य, शनि आदि पाप ग्रह स्थित हों, ऐसे लग्न वाले समय को त्याग देना चाहिए, शेष त्याज्य समय उतना अधिक विचारणीय नहीं है|
यदि जन्मपत्रिका में अशुभ योग हों, लेकिन दम्पती सन्तान प्राप्ति के लिए गर्भाधान का ऐसे समय प्रयोग करे, जब उनके गोचर से पञ्चम भाव में शुभ ग्रह गमन कर रहे हों एवं विंशोत्तरी दशा भी श्रेष्ठ ग्रहों की हो, तो सन्तान प्राप्ति के योग निश्‍चित रूप से बन जाते हैं| ऐसी स्थिति में सिर्फ नक्षत्र एवं लग्न की शुद्धि करके भी गर्भाधान किया जाए, तो स्वस्थ एवं सुन्दर सन्तान की प्राप्ति होती है|
वहीं विंशोत्तरी दशा एवं गोचर से समय अनुकूल नहीं हो, तो श्रेष्ठ गर्भाधान संस्कार का मुहूर्त भी इतना कारगर नहीं हो पाएगा|
उपर्युक्त सभी तथ्यों का विचार कर सन्तान सम्बन्धी फल कथन कहा जाए, तो निश्‍चित रूप से फलादेश में सटीकता होगी| पुत्र होगा अथवा पुत्री? इसके विचार के लिए पुरुष एवं स्त्री ग्रहों की विशेष भूमिका होती है| गर्भाधान के समय यदि विंशोत्तरी दशाओं में एवं गोचर में स्त्री ग्रह बली हों साथ ही वे लग्न और पञ्चम भाव को देखते हों, तो कन्या सन्तति की प्राप्ति होती है| वहीं इस समय में पुरुष ग्रहों की दशा हो, गोचर में वे पञ्चम और लग्न भाव से सम्बन्ध बनाते हों, तो पुत्र सन्तति के योग बनते हैं| यह स्थिति भी पति एवं पत्नी दोनों की जन्मपत्रिका में विचारी जानी चाहिए|
यदि किसी दम्पती की जन्मपत्रिका में सन्तान प्राप्ति सम्बन्धी योग बिल्कुल नहीं बनते हों, तो उन्हें तत्सम्बन्धी अशुभ ग्रह का उपाय करने के साथ ही शुभ दशाओं में, शुभ गोचर में एवं शुद्ध गर्भाधान मुहूर्त के समय गर्भाधान करने से सन्तान प्राप्ति अवश्य होती है|