कब होगा आपका विवाह?

विवाह ज्‍योतिष

भारतीय संस्कृति की आश्रम व्यवस्था में गृहस्थाश्रम का अत्यधिक महत्त्व है, ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम एवं संन्यास आश्रम, इन चारों में गृहस्थाश्रम ही है, जो शेष तीनों आश्रमों का निर्वहण करता है| इस आश्रम का प्रारम्भ विवाह से होता है| शास्त्रों में गर्भाधान, नामकरण आदि षोडश संस्कारों का वर्णन है| विवाह भी इनमें से ही एक है, लेकिन यह सभी संस्कारों में से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्कार है| यह मात्र दो व्यक्तियों का मिलन ही नहीं, अपितु दो परिवारों का भी मिलन है|
प्राचीन काल में चारों आश्रमों का पालन अनिवार्य रूप से किया जाता था| २५ वर्ष की आयु विवाह के लिए निर्धारित की गई थी, क्योंकि २५ वर्ष की आयु तक जातक ब्रह्मचर्य आश्रम का पालन करता था और अपने गुरु के सानिध्य में रहकर विद्यार्जन किया करता था| इसके पश्‍चात् २५ वर्ष की आयु पूर्ण होने पर उसका विवाह होता था|
कालान्तर में आश्रम व्यवस्था विखंडित हो गई और बाल विवाह का प्रचलन अधिक हो गया, अत: अधिकतर व्यक्तियों का विवाह बाल्यावस्था में ही होने लगा| यदि वर्तमान समय की बात करें, तो आज कानूनन विवाह की आयु कन्या हेतु १८ एवं वर हेतु २१ वर्ष निर्धारित कर दी गई है| ऐसे में बाल विवाह का प्रचलन बहुत कम हो गया है|
आश्रम व्यवस्था के अनुसार विवाह का समय देखें, तो वह वर्तमान समय में ठीक नहीं बैठ पाता है, क्योंकि वर्तमान में शिक्षा ग्रहण करने की कोई निश्‍चित अवधि या आयु नहीं है| संचार के साधनों एवं माहौल के प्रभाव से जातक अपने कार्यक्षेत्र को लेकर अत्यंत महत्त्वाकांक्षी होते हैं और उच्चतर सफलता प्राप्ति के लिए स्नातक के पश्‍चात् भी एम.बी.ए., सी.एस., एम.सी.ए., पीएच.डी., एम.डी., एम.एस., डी.एम., एम.सी.एच. आदि दीर्घकालीन अध्ययन क्षेत्रों में लग जाते हैं अथवा कई बार आई.ए.एस., पी.सी.एस. जैसी बड़ी प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में लग जाते हैं| ऐसे में वे विवाह भी अधिक उम्र में ही करते हैं|
निष्कर्ष यह है कि वर्तमान समय में विवाह की कोई प्रचलित या सर्वमान्य आयु नहीं है, अत: किसी जातक का विवाह किस उम्र में होगा? यह एक विकट प्रश्‍न बनता जा रहा है| इस प्रश्‍न का उत्तर सटीकता से ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से बताया जा सकता है| विवाह काल निर्धारण से संबंधित ग्रह स्थितियों एवं योगों का विचार इस लेख में किया जा रहा है| सर्वप्रथम यहॉं विवाह विलम्ब से सम्बन्धित कतिपय ज्योतिषीय योगों का उल्लेख किया जा रहा है :
1. जन्मपत्रिका में सर्वप्रथम लग्न एवं लग्नेश पर दृष्टि डालनी चाहिए| लग्न पर शनि, मंगल आदि क्रूर ग्रहों का प्रभाव हो एवं लग्नेश त्रिकस्थ, पापकर्तरियोग में स्थित या अस्तगत हो, तो शरीर वर्ण, बाहरी व्यक्तित्व आदि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, ऐसी स्थिति में जातक का विवाह विलम्ब से होने की संभावना अधिक रहती है|
2. जातक की जन्मपत्रिका में पंचम भाव, द्वितीय भाव एवं चतुर्थ भाव की स्थिति देखें| यदि पंचमेश एवं चतुर्थेश का सम्बन्ध द्वितीयेश, लग्नेश एवं गुरु से बन रहा हो एवं गुरु और चतुर्थेश नीच या अस्तगत नहीं हो, अपितु उत्तम स्थिति में हो साथ ही लम्बे समय तक बुध या पञ्चमेश की दशा चल रही हो, तो ऐसी स्थिति में जातक उच्च अध्ययन करता है और उच्चतर डिग्रियॉं प्राप्त करता है| ऐसी स्थिति में सप्तमेश की या विवाह कारक किसी अन्य ग्रह की दशा होने पर भी जातक का विवाह विलम्ब से होता है|
3. यदि जातक से बड़े एक या दो भाई-बहिन हैं, तो उनकी जन्मपत्रिका भी अवश्य देख लेनी चाहिए| यदि उनमें से किसी की जन्मपत्रिका में सप्तम भाव पर शनि मंगल का प्रभाव है या लग्न और लग्नेश पीड़ित है अथवा शिक्षा के योग बहुत अधिक आयु तक बन रहे हैं, तो निश्‍चित रूप से जातक का विवाह विलम्ब से होता है|
4. जातक की जन्मपत्रिका में सूर्य एवं दशम भाव पीड़ित हैं एवं पिता की जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव एकादश भाव एवं दशम भाव पीड़ित हैं, साथ ही पिता को प्रतिकूल ग्रहदशा चल रही है, तो भी जातक का विवाह विलम्ब से होता है|
5. यदि जातक की जन्मपत्रिका में मंगली योग बन रहा है, शनि, मंगल, सूर्य का सप्तम भाव और सप्तमेश पर प्रभाव है या अन्य ग्रह स्थितियों के विवाह नहीं होने के या विलम्ब से होने के योग हैं, तो इनका भी ध्यान जन्मपत्रिका देखते समय रखना चाहिए और स्वविवेक के आधार पर कोई फलकथन करना चाहिए|
6. यदि जन्मपत्रिका में विलम्ब से विवाह होने का कोई योग नहीं बन रहा हो, तो २१ वर्ष के पश्‍चात् ही बन रहे योगों को देखना चाहिए, क्योंकि इससे पूर्व यदि योगों के अनुसार विवाह का समय बन रहा हो, तो भी जातक का विवाह नहीं होगा|
विवाह के समय से संबंधित सामान्य तथ्यों का उल्लेख करने के पश्‍चात् विवाह के समय को प्रभावित करने वाले योगों, भावों एवं ग्रहों का वर्णन किया जा रहा है|
जन्मपत्रिका में सप्तम भाव से विवाह का अथवा जीवनसाथी का विचार किया जाता है| विवाह से स्त्रीलाभ या पतिलाभ भी होता है| विवाह से पुरुष जातक के कुटुम्ब में वृद्धि होती है एवं स्त्री जातक के लिए स्थान परिवर्तन होता है, अत: लग्न (सप्तम से सप्तम), द्वितीय (पुरुष जातक के लिए कुटुम्ब में वृद्धि), पंचम (सप्तम से एकादश), सप्तम (विवाह का भाव), अष्टम (कन्या के लिए स्थान परिवर्तन), एकादश (लाभ का विचार) आदि भावों का विचार मुख्य रूप से किया जाता है|
नवग्रहों के अनुसार विवाह कारक ग्रहों को देखें, तो गुरु जहॉं स्त्री जातकों के लिए विवाह का प्रमुख ग्रह होता है, वहीं चन्द्र एवं श्ाुक्र पुरुष जातक के लिए स्त्री कारक ग्रह होते हैं| शनि एवं राहु की भी महत्त्वपूर्ण भ्ाूमिका होती है,क्योंकि जिस प्रकार अष्टम भाव को जन्मपत्रिका में परिवर्तन का कारक माना जाता है, उसी प्रकार शनि एवं राहु को परिवर्तनकारी ग्रहों में सर्वप्रमुख माना जाता है| किसी भी जातक के लिए विवाह से बड़ा परिवर्तन कोई नहीं हो सकता है, अत: शनि एवं राहु का विचार किया जाना तर्कसंगत है| व्यवहार में भी देखा गया है कि विवाह के समय शनि या राहु की अन्तर्दशा प्राय: होती है| इन सभी ग्रहों के अतिरिक्त पूर्वोक्त लग्न, द्वितीय, पंचम, सप्तम, अष्टम एवं एकादश भावों के स्वामी ग्रहों का विचार भी इस संबंध में करना चाहिए|
अष्टकवर्ग, गोचर, षड्‌बल, दशा-अन्तर्दशा एवं नवांश वर्ग का भी विचार विवाह समय का निर्धारण करने में किया जाता है| अष्टकवर्ग से ग्रहों के बलाबल का विचार किया जाता है| जैसा कि ऊपर हमने बताया है कि लग्नेश, द्वितीयेश, सप्तमेश आदि कई ग्रह विवाह करवाने में महत्त्वपूर्ण भ्ाूमिका निभाते हैं, लेकिन जो ग्रह अष्टकवर्ग एवं षड्बल के अनुसार निर्बल होता है, वह विवाह के योगों के अनुसार पूर्ण कारक होते हुए भी अपनी दशा-अन्तर्दशा अथवा गोचर में जातक का विवाह करवाने में असमर्थ रहता है| इसके विपरीत यदि कोई ग्रह विभिन्न योगों एवं ग्रहस्थितियों के अनुसार अपेक्षाकृत कम कारक बन रहा है, लेकिन षड्‌बल एवं अष्टकवर्गानुसार बली है, तो उसके प्रभाव वाले समय में विवाह हो जाता है|
शास्त्रों में विवाह काल निर्णय से संबंधित अनेक योग दिए गए हैं, लेकिन कुछ योग ऐसे भी हैं, जिनके अनुसार ३, ५ या ७ वर्ष की आयु में ही विवाह हो जाता है| वर्तमान समय में चूँकि बाल विवाह को कानूनन अपराध माना जाता है, अत: यह समय व्यवहार में घटित नहीं हो पाता है| यदि ऐसे योगों से यह फलादेश किया जाए कि जातक का विवाह १८ वर्ष में ही या १८ वर्ष से कुछ कम आयु में हो जाएगा, तो यह अधिक व्यावहारिक होगा| जैसे :
1. सप्तमेश श्ाुभ ग्रह की राशि में हो और श्ाुक्र स्वराशि अथवा उच्च राशि में स्थित हो, तो ५वें या ९वें वर्ष में विवाह हो जाता है|१
2. श्ाुक्र यदि द्वितीय स्थान में हो एवं सप्तमेश एकादश स्थान में स्थित हो, तो १०वें अथवा १६वें वर्ष में विवाह हो जाता है|२
3. चन्द्रकुण्डली में शनि लग्न में एवं श्ाुक्र सप्तम भाव में हो, तो १८ वर्ष की आयु में विवाह हो जाता है|३
4. जन्मकुण्डली में श्ाुक्र द्वितीय स्थान में हो एवं द्वितीयेश मंगल के साथ हो, तो २२वें या २७ वें वर्ष में विवाह होता है|४
5. लग्नेश यदि सप्तमेश के नवांश में हो एवं सप्तमेश व्यय स्थान में स्थित हो, तो २३ या २६वें वर्ष में विवाह होता है|५
6. पंचम में श्ाुक्र हो एवं राहु पंचम या नवम भाव में स्थित हो, तो ३१ से ३३ वर्ष की आयु के मध्य विवाह होता है|६
7. तृतीय भाव (भाग्य से सप्तम) में श्ाुक्र हो एवं सप्तमेश नवम भाव में स्थित हो, तो २७वें अथवा ३०वें वर्ष में विवाह होता है|७
ये सभी योग पराशर मुनि कथित हैं, लेकिन वर्तमान समय में १ से ३ संख्या तक के योग पूर्णत: घटित नहीं हो पाते हैं| उसके पश्‍चात् कहे गए योग अनेक जन्मपत्रिका में घटित होते देखे गए हैं, लेकिन इनके साथ ही यह भी देख लेना चाहिए कि योग के निर्माता ग्रह नीच, अस्तगत या बलहीन नहीं हों|
विवाह काल निर्धारण में शास्त्रकथित योगों का उल्लेख करने के पश्‍चात् कुछ अन्य ग्रह स्थितियों एवं योगों का वर्णन किया जा रहा है| इनके प्रमाण प्रत्यक्ष रूप में शास्त्रों में नहीं मिलते हैं, लेकिन व्यवहार में ये ही योग पूर्णत: विवाह के सही समय का निर्धारण कर सकते हैं|
1. सप्तमेश ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में विवाह होने की पूर्ण सम्भावना रहती है|
2. स्त्रियों की जन्मपत्रिका में यदि सप्तमेश एवं गुरु की परस्पर दशा-अन्तर्दशा विवाह योग समय में आ जाए एवं पुरुष जातकों के लिए सप्तमेश एवं श्ाुक्र की दशा-अन्तर्दशा परस्पर आ जाए, तो विवाह होने के योग बनते हैं, लेकिन पुरुषों के संबंध में यह आवश्यक है कि गुरु भी गोचरानुसार सप्तमेश से अथवा लग्न से त्रिकोण भावों या सप्तम भाव में गोचर कर रहा हो|
3. सप्तमेश, गुरु या श्ाुक्र की महादशा चल रही हो एवं इनमें से ही किसी की अन्तर्दशा भी चल रही हो, साथ ही गुरु लग्न, तृतीय, पंचम, सप्तम या एकादश में गोचरवश भ्रमणरत हो, तो ऐसे समय में विवाह की प्रबल संभावना होती है| इसमें भी यदि अष्टमेश शनि अथवा राहु की प्रत्यन्तर्दशा या सूक्ष्मदशा आ जाए, तो विवाह के योग बनते हैं|
4. प्राय: देखा गया है कि दशा एवं गोचर के अनुसार पुरुष जातक को विवाह समय में द्वितीयेश एवं स्त्री जातक को अष्टमेश या शनि अवश्य प्रभावित कर रहा होता है|
5. लग्नेश एवं सप्तमेश के राशि अंशों का योग करें| जो राशि प्राप्त हो उसमें या उससे त्रिकोण भावों में गुरु गोचर कर रहा हो एवं विवाह योग्य समय भी हो, तो उस वर्ष में प्राय: विवाह या सगाई अवश्य हो जाती है|
6. उक्त गुरु की गोचरावधि में सप्तमेश की अन्तर्दशा भी चल रही हो, तो विवाह निश्‍चित रूप से होता है| सप्तमेश यदि पापग्रह है, तो दशा के मध्य में विवाह होता है| श्ाुभ ग्रह होता है, तो दशा के प्रारंभ में विवाह होता है एवं पापग्रह होकर त्रिक भावों में (६,८,१२) हो, तो दशा के अंत में विवाह होता है|
7. सप्तमेश जिस राशि और नवमंाश में है, उनके स्वामी ग्रह, श्ाुक्र एवं चन्द्रमा इन सभी में से जो षड्‌बल में सर्वाधिक बलवान् हो, उसकी दशा में गोचरवश गुरु सप्तमेश से त्रिकोण में या युति बनाकर गोचर करे, तो उस समय में विवाह सम्पन्न होता है|
8. सप्तमेश से युक्त अथवा सप्तम भाव में स्थित ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में विवाह होता है|
9. विवाह समय के निर्धारण में ‘विवाह सहम’ का स्थान भी महत्त्वपूर्ण होता है| यदि विवाह सहम मंगल से अथवा अन्य किसी पाप ग्रह से पीड़ित है, तो ऐसी स्थिति में विवाह विलम्ब से होता है| यदि वर्ष कुण्डली में गुरु का गोचर विवाह सहम से सप्तम भाव में हो, अथवा विवाह सहम की राशि पर से ही गुरु का गोचर हो, तो उस समय में विवाह होने की पूर्ण संभावना होती हैै|
विवाह योग से संबंधित अनेक स्थितियों का वर्णन हमने किया है| उपर्युक्त वर्णित सिद्धांतों के आधार पर ज्योतिष के द्वारा उचित तर्क-वितर्क के पश्‍चात् विवाह का एकदम निश्‍चित समय ज्ञात किया जा सकता है|
संदर्भ
1. दारेशे श्ाुभराशिस्थे स्वोच्चस्वर्क्षगतो भृगु:| पंचमे नवमेऽब्दे तु विवाह: प्रायशो भवेत्‌॥ बृहत्पाराशर होराशास्त्र, सप्तम भावफलाध्याय श्‍लोक 22
2. कुटुम्ब स्थानगे श्ाुक्रे दारेशे लाभराशिगे| दशमे षोडशाब्दे च विवाह प्रायशो भवेत्‌॥ बृहत्पाराशर होराशास्त्र, सप्तम भावफलाध्याय श्‍लोक 24
3. चन्द्राज्जामित्रगेश्ाुक्रे श्ाुक्राज्जामित्रगशनौ| वत्सरेऽष्टादशे प्राप्ते विवाहं लभते नर:॥ बृहत्पाराशर होराशास्त्र, सप्तम भावफलाध्याय श्‍लोक 27
4. रन्ध्राज्जामित्रगे श्ाुक्रे तदीशे भौमसंयुते| द्वाविंशे सप्तविंशेब्दे विवाहं लभते नर:॥ बृहत्पाराशर होराशास्त्र, सप्तम भावफलाध्याय श्‍लोक 30
5. दारांशकगते लग्ननाथे दारेश्‍वरे व्यये त्रयोविंशे च षड्‌विंशे विवाहं लभते नर:॥ बृहत्पाराशर होराशास्त्र, सप्तम भावफलाध्याय श्‍लोक 31
6. भाग्याद्भग्यगते श्ाुक्रे तद्द्वये राहुसंयुते| एकत्रिंशात्त्रयास्त्रिंशे दारलाभं विनिर्दिशेत्‌॥ बृहत्पाराशर होराशास्त्र, सप्तम भावफलाध्याय श्‍लोक 33
7. भाग्याज्जामित्रगे श्ाुक्रे तद्द्यूने दारनायके| त्रिंशे वा सप्तविंशाब्दे विवाहं लभते नर:॥ बृहत्पाराशर होराशास्त्र, सप्तम भावफलाध्याय श्‍लोक 34