ऐसी स्थिति में प्राप्त होता है भाव का पूर्ण फल

ज्‍योतिष

किसी भी जन्मपत्रिका में भाव की सबलता भाव के पूर्ण फल प्रदान करती है, इसलिए फलादेश करते समय यह देखा जाता है कि कोई भाव कितना बली है? यदि कोई भाव जन्मपत्रिका में निर्बल हो, तो उस भाव के सम्बन्ध में शुभ परिणाम बहुत अल्प मात्रा में प्राप्त होते हैं, लेकिन यदि वही भाव बली है, तो जीवन में उस भाव से सम्बन्धित शुभ फलों की बहुलता रहती है|
बहुत बार देखने में आता है कि किसी भाव के स्वामी की स्थिति उच्च राशि में या स्वराशि में देखते ही उस भाव से सम्बन्धित शुभ फलों के पूर्ण रूप से प्राप्त होने के सम्बन्ध में भविष्यवाणी कर दी जाती है, जबकि यथार्थ में जातक को वैसे फल प्राप्त नहीं होते हैं| किसी भी भाव के फलों को बहुत-सी बातें प्रभावित करती हैं, यथा भावेश कहॉं स्थित है, भाव पर शुभ या अशुभ कैसे ग्रहों की दृष्टियॉं हैं एवं ऐसे ही अन्य कई तथ्य भी हैं, जिनका फलादेश करते समय सम्यक् रूप से ध्यान रखना चाहिए| तत्पश्‍चात् ही शुभ या अशुभ किसी प्रकार के फल कहने चाहिए| इसके फलस्वरूप बताया गया फल सत्यता के अधिक निकट होता है|
एक और बात जो अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है एवं प्राय: देखी जाती है, वह यह कि प्रत्येक भाव किसी एक ही प्रकार के फलों को ही नहीं दर्शाता है, अपितु वह बहुत प्रकार के फलों का परिचायक होता है| फिर भी उस भाव से सम्बन्धित एक प्रकार का फल तो शुभ रूप में प्राप्त होता है, जबकि दूसरे प्रकार का फल अशुभ रूप में प्राप्त होता है| उदाहरण के लिए पञ्चम भाव को शिक्षा एवं सन्तान दोनों का ही कारक माना जाता है, लेकिन कई जातक ऐसे होते हैं, जिनकी शिक्षा बहुत उत्तम होती है, फिर भी संतान के सम्बन्ध में उन्हें शुभ फल प्राप्त नहीं होते हैं| ऐसा क्यों होता है? यदि भाव के सबल होने मात्र से उस भाव के समस्त शुभ फल प्राप्त हो जाए, तो उक्त विसंगति दिखाई नहीं देती|
किसी भी प्रश्‍न के सम्बन्ध में विचार करते समय सीधे-सीधे उस प्रश्‍न से सम्बन्धित भाव का ही विचार किया जाता है एवं उसका शुभाशुभत्व देख कर ही फल कह दिया जाता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है, सभी भाव परस्पर सहसम्बद्ध होते हैं|
सर्वप्रथम किसी भी भाव का शुभाशुभत्व एवं बल ज्ञात करना आवश्यक है| साधारणत: किसी भी भाव के फलों को निम्नलिखित बातें प्रभावित करती हैं:
1. भाव में नैसर्गिक शुभ एवं पापग्रहों की स्थिति एवं उस भाव पर शुभ या पापग्रहों की दृष्टि |
2. भाव को लग्न मान कर उससे प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, सप्तम, नवम एवं दशम में ग्रहों की स्थिति |
3. भाव को लग्न मानकर उससे छठे, आठवें एवं बारहवें भाव का महत्त्व |
4. भावेश की केन्द्र-त्रिकोणादि भावगत स्थिति |
5. भाव, भावेश एवं भावकारक पर पाप मध्यत्व का प्रभाव |
भाव के फल का नाश करने वाले कारक
1. भाव से अष्टम भाव का स्वामी |
2. भाव से २२वें द्रेष्काण का स्वामी |
3. भाव से छठे, सातवें एवं आठवें भाव का स्वामी (यदि निर्बल हो, तभी)|
4. भाव पर क्षीण चन्द्रमा या पापी (पापग्रह के साथ स्थित) बुध की दृष्टि या भाव में स्थिति|
5. भावेश के शत्रु ग्रह की दशा और अन्तर्दशा|
भाव फल को पुष्ट करने वाले कारक
1. भाव से उपचय भाव में स्थित पापग्रह |
2. भाव से केन्द्र एवं त्रिकोण में स्थित शुभ ग्रह |
3. भाव का नैसर्गिक शुभाशुभत्व एवं केन्द्र त्रिकोणादि संज्ञा |
4. भाव पर योगकारी ग्रह की दृष्टि |
5. भाव पर भावेश की दृष्टि या पूर्ण चन्द्रमा की दृष्टि |
6. भावेश के मित्र ग्रह की या उसकी स्वयं की दशा |
भाव में नैसर्गिक शुभ या पापग्रहों की स्थिति एवं शुभ या पापग्रहों की दृष्टि
सूर्यादि नवग्रहों में चन्द्रमा, बुध, गुरु एवं शुक्र को नैसर्गिक रूप से शुभ माना जाता है एवं सूर्य, मंगल, शनि, राहु एवं केतु को पापग्रह माना जाता है| शुभ ग्रहों के किसी भी भाव में स्थित होने या दृष्टि डालने पर उस भाव से सम्बन्धित शुभ फल अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं, जबकि पापग्रह किसी भाव में स्थित होकर या किसी भाव पर दृष्टि डालकर उसके अशुभ फलों को बढ़ाते हैं, अत: किसी भी भाव पर विचार करते समय इस तथ्य का ध्यान अवश्य रखना चाहिए| किसी भी भाव से केन्द्र (१, ४, ७, १०) त्रिकोण (५, ९) एवं द्वितीय भाव विशेष महत्त्वपूर्ण होते हैं| केन्द्र एवं त्रिकोण भाव लक्ष्मीनारायण स्वरूप होते हैंएवं द्वितीय भाव स्थायी धन या संचित धन का प्रतीक होता है, अत: इन घरों में शुभ ग्रह अत्यधिक फलदायक सिद्ध होते हैं, जबकि अशुभ ग्रह व्यक्ति के विकास में बाधक सिद्ध होते हैं|
इसी प्रकार भाव से त्रिक भावों की स्थिति भी बहुत महत्त्वपूर्ण होती है| षष्ठ भाव रोग का, अष्टम भाव मृत्यु या बाधा का एवं द्वादश भाव व्यय का प्रतीक होता है| ये तीनों ही भाव जन्मपत्रिका में अशुभ होते हैं| यदि भाव का स्वामी लग्न से षष्ठ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में हो, तो उस भाव से सम्बन्धित फलों का नाश होता है| अष्टम भाव बाधक भाव होता है| किसी भाव का स्वामी अपने भाव से अष्टम में चला जाए, तो उसके फलों का नाश करता है एवं बाधा पहुँचाता है| उदाहरण के लिए भाग्येश यदि चतुर्थ भाव में स्थित हो, तो ऐसे व्यक्ति के भाग्य में बहुत अड़चनें आती हैं| द्वादश भाव से व्यय का विचार किया जाता है| इस भाव में जो भी ग्रह स्थित होता है उसके फलों का क्षय होता है, उदाहरण के लिए पंचमेश यदि चतुर्थ (पंचम से द्वादश) या द्वादश भाव में स्थित हो जाए, तो संतति नाश या विद्या हानि जैसे फल प्राप्त होते हैं| इस प्रकार सभी भावों के सम्बन्ध में यह देख लेना चाहिए कि कहीं उनका स्वामी ग्रह त्रिक भाव में तो स्थित नहीं है| ज्योतिष में द्विर्द्वादश, षडष्टक आदि अशुभ योग इन भावों के इस विशेष अशुभत्व को देखकर ही बनाए गए हैं|
भाव एवं भावेश पर पापकर्तरी योग का प्रभाव
भाव के सन्दर्भ में पापकर्तरी योग का तात्पर्य होता है, किसी भी भाव से द्वितीय एवं द्वादश भाव में पापग्रहों का होना|
पापकर्तरी योग में जो भी भाव स्थित होता है, उसके शुभ फलों में कमी आ जाती है| उदाहरण के लिए लग्न से द्वितीय एवं द्वादश भावों में यदि सूर्य, मङ्गल आदि पापग्रह स्थित हों, तो व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता है अथवा उसका व्यक्तित्व उतना प्रभावी नहीं होता है| इसी प्रकार अन्य सभी भावों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए| यह पापमध्यत्व यदि सम्बन्धित भावेश से बन रहा हो, तो भी इसी प्रकार का अशुभ फल प्राप्त होता है|
भाव का नैसर्गिक शुभाशुभत्व एवं केन्द्र त्रिकोणादि संज्ञा
द्वादश भाव नैसर्गिक रूप से भी शुभ या अशुभ होते हैं| इसका विचार भी फल विचार में बहुत महत्त्व रखता है| जन्मपत्रिका में केन्द्र (1, 4, 7,10) एवं त्रिकोण (1, 5, 9) भावों को शुभ एवं त्रिक भावों (6, 8, 12) को अशुभ माना जाता है| इनमें लग्न को विशेष शुभ माना जाता है, क्योंकि इसकी गणना केन्द्र एवं त्रिकोण दोनों के अन्तर्गत की जाती है| त्रिकोण भाव सदैव सर्वाधिक शुभ होते हैं| केन्द्र उससे कम शुभ होेते हैं एवं त्रिक भाव अशुभ फलदायक होते हैं| भावों का यह शुभाशुभत्व विशेष रूप से विचारणीय होता है| जिस प्रकार शुभ ग्रहों के किसी भाव में स्थित होने पर या शुभ ग्रहों से किसी भाव के द्रष्ट होने पर उस भाव के शुभ फलों में वृद्धि होती है, उसी प्रकार से त्रिकोण भावों के स्वामी भी जिस भाव में स्थित होते हैं या जिस भाव को देखते हैं, उसके शुभ फलों में वृद्धि करते हैं| इसके विपरीत त्रिक भावों (6, 8, 12) के स्वामी जिस भाव में स्थित होते हैं, उसके फलों में कमी आती है, लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि त्रिक भावेश यदि अन्य किसी त्रिक भाव में है, तो उस भाव के शुभ फलों में वृद्धि होती है| केन्द्र भावेशों को भी शुभ माना है, लेकिन इनमें लग्नेश के अतिरिक्त दशमेश विशेष शुभ होता है|
किसी भी भाव के सम्बन्ध में विचार करते समय उक्त सभी बातों का ध्यान रखना चाहिए| सर्वप्रथम जिस भी भाव के सम्बन्ध में विचार करना हो, उसके सम्बन्ध में यहॉं तक बताए गए सभी बातों का विचार कर लेना चाहिए, तत्पश्‍चात् उसके बल का एवं शुभ-अशुभत्व का निर्णय करना चाहिए| यदि पूर्वोक्त नियमों के अनुसार भाव की शुभता अधिक सिद्ध हो रही हो, तो भावेश के नीच होने या त्रिकस्थ होने पर भी उस भाव से सम्बन्धित फल बहुत अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं| इसी प्रकार भावेश के उच्चराशिस्थ होने पर भी यदि अन्य नियमों के अनुसार भाव निर्बल या अशुभ सिद्ध हो रहा हो, तो भाव के शुभ फल दिखाई नहीं देते हैं या अल्प मात्रा में प्राप्त होते हैं|•