कहीं आपकी जन्मपत्रिका में तो नहीं जेल जाने के योग?

ज्‍योतिष

प्रकाशन तिथि : 20 मई, 2009
जैसे ही मैंने सुना कि मनोहर को पुलिस पकड़ कर ले गई, तो मैं स्तब्ध रह गया| मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हुआ| जो व्यक्ति एक चींटी को भी नहीं मार सकता, वह कैसे कोई अपराध कर सकता है| अपराध भी ऐसा, जो पुलिस पकड़ ले जाए|
मनोहर मेरा बचपन का मित्र है| मेरे घर से अगली गली में ही उसका घर है| मैं उससे 4-5 दिन पूर्व ही मिला था, लेकिन उसने इस तरह की कोई बात मुझे नहीं बतायी थी| हॉं! इतना अवश्य मुझे पता था कि अपनी पत्नी के साथ उसके सम्बन्ध कुछ अच्छे नहीं थे| उसकी पत्नी झगड़ालू स्वभाव की थी और प्राय: उसे घरवालों से अलग रहने के लिए कहा करती थी, लेकिन मनोहर ने उसकी यह अनुचित बात कभी नहीं मानी और इसी कारण दो माह पूर्व वह उसे छोड़कर तीन वर्ष के अपने बच्चे के साथ पीहर चली गई थी| जब मैंने सारा मामला पता किया, तो हुआ वही, जिसकी मुझे आशंका थी| दरअसल अपने पिता और एक अन्य व्यक्ति के बहकावे में आकर उसकी पत्नी ने उसके खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस लगा दिया था| इसी कारण उसे कोर्ट-कचहरी तक जाना पड़ा और जेल जाने तक की नौबत आयी| यह तो अच्छा हुआ कि उसकी भलमनसाहत और सच्चाई से प्रभावित होकर कहीं भी उसे ज्यादा कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ा और बहुत शीघ्र ही उसकी जमानत हो गयी|
इस स्थिति को देखकर अब मैं यह सोचने को मजबूर हो गया कि ऐसे क्या योग थे, जिनकी वजह से इस तरह अचानक एक सीधे-साधे और निरपराध व्यक्ति को भी जेल जाना पड़ा|
ज्योतिष के अनुसार मुख्य रूप से शनि, मंगल एवं राहु ये तीन ग्रह कारागार के योग निर्मित करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं| इसके अतिरिक्त सभी लग्नों में द्वादशेश, षष्ठेश एवं अष्टमेश भी इस तरह के योग बनाने में अपनी भूमिका निभाते हैं| इस प्रकार के योगों के साथ-साथ यदि दशा भी अशुभ ग्रहों की हो, तो उन योगों को घटित होने के लिए उपयुक्त स्थिति मिल जाती है और इस प्रकार की घटना होती है|
कई बार जन्मकुण्डली में ही इस प्रकार के योग बनते हैं, तो कई बार गोचर एवं दशा-अन्तर्दशा के फलस्वरूप अल्प समय के लिए ऐसे योग बन जाते हैं| प्रस्तुत लेख मेंे उक्त आधार पर ही जेल जाने से सम्बन्धित या बन्धन में पड़ने के योगों की चर्चा की जा रही है|
जन्मपत्रिका में सूर्यादि ग्रह समान संख्या में लग्न एवं द्वादश, तृतीय एवं एकादश, चतुर्थ एवं दशम, पंचम एवं नवम, षष्ठ एवं अष्टम में स्थित हो जाएँ, तो यह एक प्रकार का बन्धन योग बनता है यथा; किसी जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव में शनि एवं द्वादश भाव में मंगल स्थित है, तो इस स्थिति में यह योग निर्मित होगा, लेकिन यदि द्वितीय में शनि और द्वादश में मंगल के साथ एक और पाप या शुभ ग्रह स्थित हो जाए, तो यह योग भंग हो जाएगा, क्योंकि उक्त दोनों भावयुगलों में समान संख्या में पाप ग्रहों का स्थित होना आवश्यक होता है| इस योग के फलस्वरूप चाहे कोई व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो? उसे जीवन में कभी न कभी जेल अवश्य जाना पड़ता है| इस योग में बन्धनयोग कारक उन ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि भी हो, तो इस योग के फल बहुत अल्पमात्रा में प्राप्त होते हैं| इस जेल यात्रा से जातक को अधिक कष्ट भी नहीं होता है, लेकिन यदि यह योग बनाने वाले पापग्रहों पर अन्य पाप ग्रहों या द्वादशेश की दृष्टि पड़ रही हो, तो यह जेल यात्रा कष्टकारक हो सकती है और लम्बे समय के लिए भी हो सकती है|
यह योग यदि शुभ ग्रहों से निर्मित हो रहा हो, तो इसका अर्थ है कि जातक ने कोई अपराध नहीं किया है अथवा बहुत छोटे से अपराध के लिए उसे सजा भोगनी पड़ी, लेकिन यदि यह योग पाप ग्रहों से निर्मित हो रहा हो, तो इसका अर्थ है उस व्यक्ति ने क्रोध, लालच, ईर्ष्या या द्वेष की भावना के वशीभूत होकर निश्‍चित रूप से अपराध किया है|
यह योग बनाने वाले ग्रह यदि शनि-मंगल या राहु में से कोई होें और साथ ही षष्ठ एवं द्वादश भावों के स्वामी भी यही हों, किसी शुभ ग्रह की इन पर दृष्टि भी नहीं हो और पापग्रहों की दशा भी चल रही हो, ऐसी स्थिति में व्यक्ति को मृत्युदण्ड या उम्रकैद की सजा मिलने की पूर्ण आशंका रहती है|
मिथुन, कन्या एवं मीन लग्न में यह योग अधिक नुकसानदायक होता है, क्योंकि इन लग्नों में त्रिक भावों में किन्हीं दो भावों के स्वामी पाप ग्रह होते हैं, जबकि तुला लग्न में यह योग कम फलप्रद होता है, क्योंकि तीनों त्रिक भावों के स्वामी सौम्य ग्रह हैं| शेष लग्नों में यह योग सामान्य फल देता है|
जन्मपत्रिका में लग्न भाव जातक का स्वयं का प्रतीक होता है| यदि लग्नेश के साथ षष्ठेश (शत्रु कारक) की युति केन्द्र अथवा त्रिकोण भाव में हो और राहु या केतु भी इनके साथ स्थित हों, तो इस स्थिति में भी कारावास योग बनता है| यदि इन दोनों (लग्नेश एवं षष्ठेश) की स्थिति पूर्वोक्त ही हो अर्थात् केन्द्र या त्रिकोण में ही हो और इनकी युति शनि से बन रही हो, तो जातक को जेल जाना पड़ता है| इतना ही नहीं जेल में उसे यातना एवं भूख-प्यास भी सहनी पड़ती है|
तीन ग्रहों की युति के कारण भी जेल योग बनता है यथा; जातक की जन्मपत्रिका के नवम भाव में सूर्य, शुक्र एवं शनि की युति हो, तो किसी अनैतिक कार्य के लिए या ऐसा कार्य जो समाज में अत्यन्त निन्दित हो, के लिए जेल यात्रा होती है| यदि पंचमेश अथवा सप्तमेश शुक्र की युति नवम भाव में शनि एवं मंगल के साथ हो, तो स्त्री सम्बन्धी किसी मामले के कारण कोर्ट केस होता है और कुछ दिन जातक को जेल में ही रहना पड़ता है|
यदि द्वादश भाव में शनि एवं नवम भाव में मंगल स्थित हो, तो जातक को अपने जन्मस्थान से दूर किए गए किसी अपराध के लिए जेल जाना पड़ता है| इतना ही नहीं इस मामले में उसका काफी धन भी खर्च होता है|
द्वितीय एवं पंचम ये दोनों ही भाव व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं| द्वितीय भाव जहॉं स्थायी धन का कारक है, वहीं पंचम भाव आकस्मिक धन और एकादश भाव से सप्तम होने के कारण लाभ का भी प्रतीक है| यदि शनि, राहु, मंगल, सूर्य एवं केतु ये ग्रह इन दोनों भावों में स्थित हो जाएँ, तो व्यक्ति को टैक्स चोरी, तस्करी, कालाबाजारी इत्यादि धन सम्बन्धित मामलों के कारण जेल जाना पड़ता है| यह भी हो सकता है कि वह किसी अन्य कार्य से जेल जाए, लेकिन उसे आर्थिक हानि बहुत अधिक हो जाए या उसकी सम्पत्ति जप्त कर ली जाए|
प्रसिद्ध ज्योतिषी वराहमिहिर के अनुसार यदि किसी जातक का जन्म सर्प द्रेष्काण, निगड़ द्रेष्काण या आयुध द्रेष्काण में हो, तो कारावास एवं दण्ड के योग बनते हैं| सर्प द्रेष्काण में केवल कारावास या ऩजरबन्दी होती है| आयुध द्रेष्काण में कारावास नहीं होता है, लेकिन प्रताड़ना होती है, जबकि निगड़ द्रेष्काण में कारावास और सजा दोनों प्राप्त होते हैं|
द्वादश भाव जैसा कि हम पूर्व में बता चुके हैं सजा, बन्धन, दबाव इत्यादि से विशेष सम्बन्ध रखता है, में पापग्र्रहों की स्थिति बहुत परेशानीदायक होती है| यदि द्वादश भाव के साथ-साथ द्वितीय भाव में भी उतने ही ग्रह स्थित हो जाएँ, तो स्पष्ट रूप से बन्धन योग बनेगा, लेकिन यदि शनि, राहु या सूर्य इसमें स्थित हों, तो यह आवश्यक नहीं है कि जातक को जेल जाना पड़े, लेकिन ऐसा जातक सदैव किसी न किसी के दबाव में या वश में रहता है| यह दबाव पिता का, माता का, पत्नी का, मित्र का या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का भी हो सकता है| ऐसा व्यक्ति कोई भी महत्त्वपूर्ण निर्णय स्वयं नहीं ले सकता है, अन्य किसी व्यक्ति का हस्तक्षेप उसमें अवश्य होता है| इस कारण वह जातक बहुत मानसिक क्लेश और पीड़ा का अनुभव करता है|
यदि द्वादश भाव में मेष, सिंह, वृश्‍चिक, मकर या कुम्भ राशि हो, सूर्य, मंगल, शनि, राहु या केतु में से कोई एक या अधिक ग्रह इस भाव में स्थित हों, षष्ठेश, अष्टमेश या द्वादशेश की इन पर दृष्टि हो, कोई शुभ ग्रह द्वादश भाव को नहीं देख रहा हो और द्वादशेश नवांश में त्रिक भावगत, नीच अथवा शत्रु राशिगत हो, तो इस स्थिति में जातक को अल्पायु में ही जेलयात्रा करनी पड़ती है| यदि अल्पायु में जेल का कष्ट नहीं प्राप्त हो, तो फिर उसे और उसके अन्य परिजनों को भी उसके कारण जेल के दु:ख भोगने पड़ते हैं|
कई बार जेलयोग जन्मपत्रिका में नहीं होने पर भी दशा-अन्तर्दशा और गोचर के ग्रहों की अशुभ स्थिति के फलस्वरूप जेलयात्रा हो जाती है यथा; शनि या मंगल की महादशा में द्वादशभावस्थ राहु की अन्तर्दशा आ जाए, गोचरानुसार जन्मकालीन सूर्य पर से शनि या राहु का गोचर हो और द्वादश एवं लग्न भाव भी पाप ग्रह के प्रभाव में हो, तो इसके फलस्वरूप भी बन्धन में पड़ने या कुछ समय के लिए जेल जाने के योग बन सकते हैं|
कैसे बचें कारावास योग से?
यदि समय रहते आपको कारावास सम्बन्धी योग पता चलते हैं या इस तरह की स्थिति आपके सामने आती है, तो रेमेडियल एस्ट्रोलॉजी की सहायता से आप इस योग को समाप्त या उसकी तीव्रता को कम कर सकते हैं| इस प्रकार के योगों से बचने के लिए निम्नलिखित उपायों का सहारा लेना चाहिए :
1. सर्वप्रथम यह पता करें कि किन ग्रहों के कारण यह योग निर्मित हो रहा है| फिर उस ग्रह की शान्ति हेतु उसके चतुर्गुणित जप करवाएँ, हवन करें, निश्‍चित संख्या में उससे सम्बन्धित वार के व्रत करें और तदनुसार सम्बन्धित वस्तुओं का दान करें|
2. शुभ मुहूर्त में भगवान् शिव के नर्मदेश्‍वर शिवलिंग पर सात सोमवार तक सहस्रघट करवाएँ|
3. अपनी आयु वर्षों के चतुर्गुणित संख्या में किलोग्राम ज्वार लें और जिस ग्रह के कारण यह योग बन रहा हो, उस ग्रह के वार को या शनिवार को प्रारम्भ कर ज्वार एक-एक मुट्ठी डालते हुए कबूतरों को खिलाएँ|
4. यदि आपने वास्तव में अपराध किया है, तो यह निश्‍चित है कि आपको उसकी सजा मिलेगी, इतना अवश्य है कि उपाय करने से या प्रायश्‍चित से वह सजा कम हो जाएगी| जिस व्यक्ति के प्रति आपने अपराध किया है, उससे क्षमा मॉंगें| इसके अतिरिक्त शनिवार से प्रारम्भ कर किसी शिव मन्दिर में जाएँ और भगवान् के समक्ष अपने सारे अपराध स्वीकार करें| यह ध्यान रखें कि मन्दिर आपके घर के पास में नहीं हो, थोड़ा दूर हो और वहॉं आप नंगे पैर ही जाएँ|
5. शनिवार से प्रारम्भ कर चालीस दिनों तक मूँगा के हनूमान् जी की मूर्ति के समक्ष हनूमान् चालीसा के प्रतिदिन 100 पाठ करें या करवाएँ| पाठ से पूर्व संक्षेप में हनूमान् जी की पूजा भी करें|
6. शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ कर ११ पण्डितों से ‘बन्दीमोचन स्तोत्र’ के 3100 पाठ करवाएँ|
7. जेल योग दूर करने के लिए यह टोटका अत्यन्त प्रसिद्ध और अनुभूत है| इसके अन्तर्गत अपनी जान-पहचान से या अन्य किसी की सहायता से एक दिन के लिए जेल जाएँ, वहॉं का भोजन करें और रात्रिकाल में वहीं शयन करें| इस उपाय से जेलयोग पूरा भी हो जाएगा और टल भी जाएगा|•