जीवन जीने की कला सिखाते हैं श्री श्री रविशंकर

होरोस्‍कोप एनालिसिस

प्रकाशन तिथि : मार्च, 2010
‘आर्ट ऑव लिविंग फाउण्डेशन’ के जनक श्री श्री रविशंकर वर्तमान में भारत ही नहीं, वरन् विश्‍वभर में अपने आध्यात्मिक प्रभाव से लाखों लोगों के जीवन को परिवर्तित कर चुके हैं| किसी भी मानवीय त्रासदी के पश्‍चात् उनकी मानसिक प्रगति के लिए वे वहॉं पहुँच ही जाते हैं| विशेष रूप से सन् 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले के पश्‍चात् वहॉं के लोगों को ‘आर्ट ऑव लिविंग’ के जरिए उबारने वाले श्री श्री रविशंकर कई स्थानों पर चमत्कार दिखा चुके हैं| उन्होंने अपने संगठन का नाम भी ‘द इंटरनेशनल आर्ट ऑव लिविंग फाउण्डेशन’ रखा है, जिसकी स्थापना उन्होंने सन् 1982 में की थी| यह संगठन किसी भी व्यक्ति को चिन्ता एवं दु:खों से उबरने में मदद करता है और उसमें विद्यमान हर तरह की हिंसा के भाव को समाप्त करता है| इसके अतिरिक्त शिक्षा, सामाजिक विकास आदि का कार्य भी इनका संगठन करता रहा है| अपनी स्थापना से ही यह गैर सरकारी संगठन अपने सामाजिक दायित्व के लिए अत्यधिक प्रसिद्ध रहा है| इसके अतिरिक्त श्री श्री ने सन् 1997 में ‘द इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज’ की स्थापना भी की, जो मानवीय समाज को गहराई से समझने में और उनकी प्राथमिकताओं को पूरी करने में मदद करता है| इनके उक्त संगठन न सिर्फ अपनी अध्यात्म शैली से मनुष्यों के मनोविकारों को दूर करते हैं, बल्कि सामान्यजन के लिए आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, सद्भाव और ग्रामीण उत्थान के लिए भी कार्यरत हैं| इनके संगठन के युवा कार्यकर्ता वर्तमान में हजारों गॉंवों में उक्त कार्य कर रहे हैं|
श्री श्री रविशंकर एक महान् दार्शनिक भी हैं| वे ध्यान क्रिया और अध्यात्म के द्वारा मनुष्यों के मस्तिष्क में चल रही हर प्रकार की समस्याओं को समाप्त करने में यकीन रखते हैं| वे हिंसा को समाप्त कर उसके स्थान पर ज्ञान और प्रगति का संदेश मानव मस्तिष्क में भर देना चाहते हैं| उनके अनुसार सत्य एक वृत्त के समान है, न कि एक रेखा के समान, इसलिए वह अपने-आप में कई प्रकार के विरोधाभास रखता है| एक गोलीय वस्तु हमेशा अपने अन्दर कई प्रकार के विरोधाभास लेकर चलती है|
अमेरिका में 9/11 आतंकी हमले के पश्‍चात् वहॉं के लोगों को चिन्ता से बाहर निकालने के अतिरिक्त श्री श्री रविशंकर के फाउण्डेशन ने सन् 2003 में इराक में वहॉं की जनता को युद्ध से उबरने में मदद की| सन् 2003 से सन् 2006 तक अफगानिस्तान में भी उनका संगठन सक्रिय रहा| वे सन् 2004 में पाकिस्तान गए और वहॉं के राजनीतिक तथा धार्मिक गुरुओं से मिले और विश्‍व शान्ति का सन्देश दिया| सन् 2004 में जब सुनामी ने भारत सहित एशिया के कई देशों में कहर ढहाया था, तब उनके संगठन से जुड़े व्यक्तियों ने पीड़ितों की मानवीय मदद की| ऐसी ही मदद अमेरिका के ‘केटरीना’ तूफान पीड़ितों के लिए भी की गई| श्री श्री रविशंकर ने जेल में रहने वाले कैदियों को भी ध्यान के द्वारा मानसिक शान्ति दी और उनके पुनर्वास का प्रयास किया| श्री श्री रविशंकर के प्रयास वर्तमान में विश्‍वभर में प्रसिद्ध हैं| उनका मुख्य आश्रम बेंगलुरु में स्थित है, जहॉं इनके अनुयायियों को सुदर्शन क्रिया सिखाई जाती है, जो ‘आर्ट ऑव लिविंग’ के अन्तर्गत कोर्स का एक हिस्सा है|
श्री श्री रविशंकर का जन्म दक्षिण भारत में तमिलनाडु राज्य में ‘पापनाशम्’ नामक स्थान पर हुआ था| ऐसा माना जाता है कि ‘पापनाशम्’ वह स्थान है, जहॉं भगवान् श्रीराम के ब्रह्म हत्या के दोष का निवारण हुआ और उनके पापों का नाश हुआ, इसलिए इस जगह का नाम ‘पापनाशम्’ पड़ा| इनके पिता का नाम वेंकटरत्नम् था, जो कि ऑटोमोबाइल इण्डस्ट्री से जुड़े व्यवसायी थे| व्यवसायी होने के साथ ही वे वैदिक विद्वान् भी थे| इनकी माता का नाम विशालाक्षी था| श्री श्री रविशंकर का जन्म रविवार एवं शंकराचार्य जयन्ती के दिन होने के कारण इनका नाम रविशंकर रखा गया| परिवार के पुरोहित जो नारायण मन्दिर के पुजारी थे, उन्होंने रामानुजाचार्य जयन्ती भी होने के कारण इनके नाम में नारायण भी जोड़ दिया| इस प्रकार इनका नाम पड़ा रविशंकर नारायण| बचपन से ही इन पर भारतीय धर्म एवं दर्शन का पूर्ण प्रभाव था| इनके पिता महर्षि महेश योगी के अनुयायियों में से एक थे| इसलिए वे अक्सर बालक रविशंकर को भी अपने साथ महर्षि के पास ले जाया करते थे| एक तरफ जहॉं श्री श्री रविशंकर ने सेंट जोसेफ कॉलेज से मॉडर्न फिजिक्स विषय से बी.एससी. की शिक्षा प्राप्त की, वहीं महर्षि महेश योगी के अनुगामी भी बने| उनसे वैदिक शिक्षा प्राप्त की और उनके संगठन के लिए कार्य किया| रविशंकर नौकरी नहीं करना चाहते थे, परन्तु मॉं की जिद पर एक बार बैंक का इंटरव्यू देने दिल्ली गए| जब रविशंकर का इंटरव्यू हुआ, तो इंटरव्यू बोर्ड के सदस्य भी चकित रह गए, क्योंकि असली इंटरव्यू तो उन सदस्यों का ही हो रहा था| उनके मध्य देर तक साधना-अध्यात्म पर व्याख्यान का दौर चल पड़ा|
सन् 1975 में बेंगलुरू में एक सेमीनार का आयोजन हुआ| सभी क्षेत्रों के ख्याति प्राप्त विद्वान् उसमें उपस्थित थे| उसका विषय था, वैदिक ज्ञान एवं विज्ञान| उस समय रविशंकर मात्र 19 वर्ष के थे, लेकिन जब वे मंच पर आकर बोलने लगे, तो सभी दंग रह गए| वहॉं उपस्थित विद्वत्‌जन उन्हें सुनते ही रह गए| उनकी विज्ञान एवं वेद पर समान पकड़ थी| वे दोनों ही विषयों पर धाराप्रवाह बोल रहे थे| मंच पर बैठे सेमिनार के सूत्रधार जो स्वयं अन्तरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान् थे और जिन्हें सैंकड़ों गोष्ठियों का अनुभव था, वे भी रविशंकर से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके| उन विद्वान् का नाम था महर्षि महेश योगी| तत्त्पश्‍चात् महर्षि महेश योगी ने एक सन्त सम्मेलन करवाया| इसमें स्वागत एवं आतिथ्य की जिम्मेदारी श्री श्री रविशंकर को मिली| रविशंकर के कुशल प्रबंधन एवं नेतृत्व क्षमता से वे अत्यन्त प्रभावित हुए, इसलिए सन् 1980 में उन्होंने नोएडा में विशाल यज्ञ के आयोजन की जिम्मेदारी भी रविशंकर को ही दी| इसका आयोजन भी अत्यधिक सफल रहा| इसी कारण वे रविशंकर को अधिक मानने लगे और उन्हें अपने प्रतिनिधि के तौर पर देश-विदेश में भेजने लगे| शीघ्र ही रविशंकर को कर्नाटक भेजा गया| उन्होंने ‘शिमोगा’ का चुनाव किया| यहॉं आकर श्री श्री रविशंकर ने शिक्षण संस्थान खोले| इन संस्थानों में वेद और विज्ञान दोनों की पढ़ाई एक साथ होती थी| गॉंवों के मठों में ये स्कूल चलाए जा रहे थे| साथ ही श्री श्री रविशंकर प्रवचन देने एवं ध्यान सिखाने का काम भी कर रहे थे| जल्द ही महर्षि महेश योगी ने श्री श्री को बेंगलुरू में वेद विज्ञान विद्यापीठ शुरू करने को कहा| इसके लिए ट्रस्ट भी बना| इस स्कूल में 200 बच्चों का प्रवेश हुआ| कुछ ही समय पश्‍चात् श्री श्री रविशंकर को संदेश प्राप्त हुआ कि महर्षि दक्षिण भारत से स्कूल को बन्द करके दिल्ली में खोलना चाहते हैं| बच्चों को भी दिल्ली लाने को कहा गया, परन्तु किसी भी बच्चे के माता-पिता बच्चों को दिल्ली भेजने को तैयार नहीं थे| इसी घटना के पश्‍चात् महर्षि महेश योगी और श्री श्री रविशंकर की राहें पृथक् हुईं और श्री श्री ने स्वयं इन बच्चों की शिक्षा एवं आवास की व्यवस्था करने का निर्णय लिया| यह बात सन् 1982 की है| तब श्री श्री 26 वर्ष के युवा थे| कर्नाटक का शिमोगा जो कई नदियों का उद्गम स्थल है, यहीं तुंगभद्रा नदी के किनारे श्री श्री दस दिनों तक मौन में रहे| जब मौन की क्रान्ति खत्म हुई, तो सुदर्शन क्रिया अर्थात् ‘आर्ट ऑव लिविंग’ का जन्म हुआ| वही ‘आर्ट ऑव लिविंग’ आज विश्‍व के 150 देशों में फैल चुका है| ‘द इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर ह्यूमन वैल्यूज’ भी ‘आर्ट ऑव लिविंग’ की संस्था है, जो प्राकृतिक विपदा में राहत का काम करती है| इसका मुख्यालय जिनेवा में है| भारत के आतंकवाद प्रभावित कई क्षेत्रों में यह संगठन अपना कार्य कर रहा है| जहॉं-कहीं भी मानव जाति पर किसी भी प्रकार की विपदा होती है, तो यह संगठन वहॉं पहुँचकर मनुष्य की सेवा में तत्पर रहता है| उक्त संगठन के अतिरिक्त सन् 2003 में ‘श्री श्री इन्स्टीट्यूट ऑव आयुर्वेदिक साइन्स एण्ड रिसर्च’ की स्थापना भी हुई, जहॉं साढ़े चार साल के कोर्स के बाद डीएएमएस की डिग्री प्राप्त होती है| साथ ही ‘श्री श्री परफॉर्मिंग आट्‌र्स एण्ड फाइन आट्‌र्स स्कूल’ हैं, जहॉं पारम्परिक, शास्त्रीय लोकनृत्य, गीत-संगीत एवं ललित कला का प्रशिक्षण दिया जाता है| बेंगलुरू में ही ‘श्री श्री इन्स्टीट्यूट ऑव इंटरनेशनल लेंग्वेज’ भी है| इन प्रयासों के अतिरिक्त शोषित बालकों के लिए 40 अनौपचारिक स्कूल, जिनमें 10,000 छात्र पढ़ रहे हैं और 30 सेवा स्कूल गॉंवों और आदिवासी इलाकों में हैं| भुवनेश्‍वर से 40 किलोमीटर की दूरी पर ‘श्री श्री यूनिवर्सिटी’ बन रही है, जहॉं 15,000 छात्रों के लिए 1,500 शिक्षक होंगे| इस विश्‍वविद्यालय में वैदिक ज्ञान, कला, गणित, प्रबन्धन, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, मेडिकल, आयुर्वेद, बायोसाइंसेज, संस्कृति, उड्डयन एवं मैरीन की उच्चतर शिक्षा प्रदान की जाएगी| श्री श्री रविशंकर का यह प्रयास अनूठा है| वह वैदिक ज्ञान को आज के दौर की शिक्षा के साथ मिलाकर चलाना चाहते हैं, जो कि एक बेहतरीन कदम है| इससे भारतीय संस्कृति और उसका वैदिक ज्ञान सदा के लिए अमर हो जाएगा और सभी के लिए सुलभ भी|
श्री श्री रविशंकर ने कई पुस्तकें लिखीं| वर्तमान में उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकों की संख्या 37 से भी अधिक हैं| प्रत्येक पुस्तक के जरिए उन्होंने मानव जाति को नया सन्देश देने का प्रयत्न किया है| उनकी ‘आर्ट ऑव लिविंग’ और ‘सुदर्शन क्रिया’ के द्वारा मनुष्य सहज रूप से स्वयं को जान सकता है| सुदर्शन क्रिया एक उपयोगी अभ्यास है|
श्री श्री रविशंकर का जन्म 13 मई, 1952 को मेष लग्न और धनु नवांश में पापनाशम् (तमिलनाडु) में हुआ| जन्म के समय पंचमेश सूर्य, लग्नेश और अष्टमेश मंगल एवं भाग्येश तथा व्ययेश गुरु अपनी-अपनी उच्च राशि में स्थित होकर क्रमश: लग्न, दशम और चतुर्थ भाव में स्थित थे| शेष ग्रहों में शुक्र-चन्द्रमा तृतीय भाव में, राहु-शनि अष्टम भाव में एवं बुध-केतु द्वितीय भाव में स्थित थे|
मंगल दशम भाव में उच्च राशिगत होकर रुचक नामक पंचमहापुरुष योग का निर्माण कर रहा था, वहीं गुरु चतुर्थ भाव में उच्च राशिगत होकर हंस नामक पंचमहापुरुष योग बना रहा था| मेष लग्न के प्रमुख कारक योगों की यह श्रेष्ठतम स्थिति उनके श्रेष्ठ व्यक्तित्व और बुद्धि की श्रेष्ठता को दर्शाती हैं| पंचमेश सूर्य का उच्च राशिगत होकर लग्न भाव में स्थित होना आत्मविश्‍वास को एवं करोड़ों अनुयायियों को दर्शाता है, वहीं नवमेश एवं द्वादशेश गुरु का चतुर्थ भाव में उच्च राशिगत होना श्रेष्ठ आध्यात्मिक शक्ति, गुरुत्व, बुद्धि और विद्या के योग बनाता है| वाणी भाव का कारक बुध द्वितीय भाव में ही स्थित है और गुरु एवं सूर्य की स्थिति भी बली है| यही कारण है कि श्री श्री रविशंकर की वाणी का ओजस्व तथा उनकी तर्कपूर्ण वाणी से प्रभावित होकर कई बुद्धिजीवियों ने उनका अनुकरण किया| इसीलिए आज वे ऐसे ही व्यक्तियों में अधिक प्रसिद्ध हैं| मंगल की पंचमेश एवं पंचम तथा लग्न भाव पर दृष्टि इन्हें न सिर्फ आत्मविश्‍वासी बनाती है बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी बिना हिम्मत हारे अपना कार्य करने की क्षमता प्रदान करती है| यही कारण है कि महर्षि महेश योगी से पृथक् होने के पश्‍चात् भी इन्होंने बिना हिम्मत हारे 200 बच्चों की शिक्षा-दीक्षा एवं आवास, भोजनादि व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाया जबकि इनके पास आय का सुनिश्‍चित साधन नहीं था| जब ‘आर्ट ऑव लिविंग फाउण्डेशन’ की स्थापना हुई थी, उस समय इस संगठन में दहाई की संख्या में लोग थे, जो अब बढ़कर लाखों तक पहुँच चुकी है| तृतीय भाव में शुक्र-चन्द्रमा की युति इन्हें स्वभाव से सरल बनाती है, वहीं कर्मेश तथा लाभेश शनि का अष्टम भाव में स्थित होना तथा उस पर नवमेश और व्ययेश गुरु की दृष्टि इनके श्रेष्ठ आध्यात्मिक ज्ञान को दर्शाती है, वहीं अष्टमेश और कर्मेश का राशि परिवर्तन भी इस योग को पुष्ट करता है| ग्रहों की इस श्रेष्ठ स्थिति के कारण ही श्री श्री रविशंकर का यश और कीर्ति भारत ही नहीं वरन् पूरे विश्‍व में फैली और उनके द्वारा बताए जाने वाली ‘आर्ट ऑव लिविंग’ को विश्‍व के बुद्धिजीवियों ने सहजता से ग्रहण किया| दशाओं के आधार पर देखें, तो गुरु महादशा में जिस ‘आर्ट ऑव लिविंग फाउण्डेशन’ की स्थापना श्री श्री रविशंकर जी ने की थी, उसका विकास एवं पहचान सन् 1992 में शनि महादशा प्रारम्भ होने के पश्‍चात् ही हो पाया| इससे पूर्व उनके प्रयास अपने ‘आर्ट ऑव लिविंग’ को सामान्यजन तक पहुँचाने के लिए और व्यक्तियों के मानसिक दु:खों के दूर करने के लिए श्री श्री का प्रयास लगातार जारी रहा| धीरे-धीरे उनकी सुदर्शन क्रिया भारत से बाहर भी फैलने लगी| यह वह समय था जब अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर ओशो के रिक्त हुए स्थान को पूर्ण करने के लिए एवं भारतीय दर्शन के प्रवक्ता के रूप में श्री श्री रविशंकर जैसे आध्यात्मिक गुरु की ही आवश्यकता थी, जिसे उन्होंने पूरी तत्परता के साथ पूर्ण किया|•