आखिर क्यों नहीं आ पाते अनुकूल प्राप्तांक

ज्‍योतिष

जब विद्यार्थी लक्ष्यबद्ध होकर नियमित रूप से परीक्षाओं की तैयारी करता है, तो ऐसे में वह उत्साहपूर्ण सकारात्मक सोच को अपने भीतर समाहित करके संघर्षरत रहता है, ताकि उत्तम/अनुकूल प्राप्तांक उसकी झोली में आ जाए| उसका ऐसा सोचना बिल्कुल युक्तिसंगत है, लेकिन दुर्भाग्यवश कई छात्र परीक्षा परिणाम में अनुकूल प्राप्तांक प्राप्त नहीं कर पाते, जबकि अन्य छात्रों की भॉंति लक्ष्यबद्ध नियमित रूप से ये लोग अध्ययनरत रहकर ही परीक्षा देते हैं? आइए, ज्योतिष के आइने में ऐसे विद्यार्थियों की तज्जन्य विफलता का विश्‍लेषण करें|
सर्वप्रथम जातक की जन्मकुण्डली के अन्तर्गत चतुर्थ भाव से शिक्षा प्राप्ति, पंचम भाव से बुद्धि, स्मरणशक्ति तथा ग्रहांें में बुध से बुद्धि और लेखन क्षमता तथा बृहस्पति से ज्ञान प्राप्ति की स्थिति और उस प्रदत्त ज्ञान का लाभ देखा जाता है| उपर्युक्त के साथ ही साथ हम कुण्डली के तृतीय भाव को भी सम्मिलित करेंगे, क्योंकि यह लेखन कला को दर्शाता है|
ध्यान देने योग्य बात यह है कि पंचम स्थान से बुद्धि, विवेकशक्ति, एकाग्रता और स्मरणशक्ति का विचार किया जाता है, जबकि चतुर्थ भाव से शिक्षा प्राप्ति में सफलता या यों कहें कि पाठ्यक्रम का सुचारू रूप से अध्ययन करके, परीक्षा में सफलता की स्थिति का विचार किया जाता है| दूसरी ओर सारवत् रूप से चतुर्थ भाव से शिक्षा में सफलता का विचार किया जाता है| ‘ज्योतिष रत्नाकर’ ग्रन्थ के रचयिता दैवज्ञ देवकीनन्दन सिंह ने भी चतुर्थ, पंचम भाव के सन्दर्भ में युक्तियुक्त सत्य ही लिखा है कि चतुर्थ स्थान से विद्या का विचार किया जाता है और पंचम भाव से बुद्धि का विचार किया जाता है| विद्या और बुद्धि में घनिष्ठ सम्बन्ध है|१
इस प्रकार दूसरी ओर बुध और गुरु के सन्दर्भ में आधुनिक विद्वान् पं. गोपेश ओझा ने भी फलदीपिका के सम्पादन में एक स्थान पर लिखा है, ‘‘बृहस्पति बलवान् होने से मनुष्य बहुत बुद्धिमान् (विवेकशील) होता है| बुध से भी बुद्धि देखी जाती है और बृहस्पति से भी| तब दोनों से ही बुद्धि का विचार किया जाए, तो तारतम्य क्या होगा? बुध से किसी बात को शीघ्र समझ लेना, किसी विषय का शीघ्र ही हृदयांगम हो जाने आदि का विचार किया जाना चाहिए, किन्तु बृहस्पति से विचार करने की शक्ति दृढ़ होती है|२’’
उपर्युक्त सभी बातों के आधार पर निम्नलिखित बिन्दुओं के उपागम द्वारा हम जातक के शैक्षणिक लाभ अथवा यों कहें कि पाठ्यक्रम परीक्षा में अनुकूल प्राप्तांक की स्थिति के सन्दर्भ में विवेचन कर सकते हैं :
(क) चतुर्थ भाव और भावेश
(ख) पंचम भाव और भावेश
(ग) बुध ग्रह की स्थिति
(घ) बृहस्पति ग्रह की स्थिति
(ङ) तृतीय भाव और तृतीयेश की स्थिति|
जातक की जन्मलग्न कुण्डली के अन्तर्गत चतुर्थ भाव का स्वामी स्व या उच्च राशि में हो और इस भाव पर शुभ ग्रहों की स्थिति या दृष्टिजन्म प्रभाव हो, ऐसे में बृहस्पति भी केन्द्र-त्रिकोणादि भावों में से कहीं भी स्व, उच्च राशि में स्थित हो, लेकिन पंचम भाव जो कि एक त्रिकोण भाव है| इसमें न हो, तो जातक को शिक्षा प्राप्ति में अवरोध का सामना नहीं करना पड़ता और पाठ्यक्रम (डिप्लोमा, सर्टीफिकेट, डिग्री) में लगभग अनुकूल प्राप्तांक की प्राप्ति की पूर्ण संभावनाएँ बनती हैं|
उपर्युक्त के साथ ही साथ यदि जातक के पंचम भाव का स्वामी ग्रह स्व या उच्च राशि में सुस्थान (केन्द्र-त्रिकोणादि) में से कहीं भी स्थित हो और ऐसी ही सबल स्थिति बुध ग्रह की भी हो, तो जातक तीक्ष्ण मस्तिष्क वाला, उत्तम स्मरणशक्ति और विषय-वस्तु को शीघ्र हृदयांगम करने वाला होगा| फलस्वरूप परीक्षोपयोगी प्रश्‍नोत्तर एवं विषय को अच्छी तरह से स्मरण कर पाएगा तथा उसके समझने की शक्ति तीव्र होगी| ऐसे में वह परीक्षोपयोगी विषय-वस्तु को शैली विशेष में सटीक रूप से अभिव्यक्त कर पाएगा| ऐसी ग्रह स्थितियों के परिणामस्वरूप जातक निश्‍चित रूप से मनोनुकूल प्राप्तांक प्राप्त करने की पूर्ण सम्भावना के दायरे में आ जाएगा|
अब बात करते हैं तृतीय भाव के बारे में, तो तृतीयेश स्वयं स्व या उच्च राशि में हो और इस भाव पर भी शुभ ग्रहों की दृष्टि अथवा युति हो, तो जातक लेखन कला में दक्ष होगा| उसका लेखन गति पर और अभिव्यक्ति पर भी पूर्ण नियन्त्रण होगा| ऐसे में क्या लिखना और कितना लिखना है? उस सन्दर्भ में वह अपनी विशिष्ट चैतन्य शक्ति द्वारा लाभ प्राप्त कर पाएगा|
इस प्रकार हमने पहले ‘क’ से लेकर ‘ङ’ बिन्दुओं का शिक्षाजन्य मनोनुकूल प्राप्तांक प्राप्ति के सन्दर्भ में विश्‍लेषण किया| जितने अधिक बिन्दुओं की सबल स्थिति जातक की जन्मकुण्डली में पूर्ण रूप से प्राप्त होगी, उतना ही वह शैक्षणिक पाठ्यक्रमों की परीक्षाओं में मनोनुकूल प्राप्तांक अपने भाग्य की निधि में अर्जित कर पाएगा, जबकि इसके ठीक विपरीत हमारे द्वारा वर्णित बिन्दुओं की उत्तरोत्तर निर्बलता जितनी अधिक जिस जातक की कुण्डली में परिलक्षित होगी, वह उतना ही अनुकूल प्राप्तांक प्राप्ति के सन्दर्भ में दुर्भाग्यशाली होगा जैसे :
(क) चतुर्थ भाव में कोई पाप ग्रह नीच, शत्रु राशि में हो और इस भाव का स्वामी अस्त, नीच अथवा शत्रुक्षेत्री हो|
(ख) पंचम भाव का स्वामी ग्रह नीच या अस्त हो अथवा छठे, आठवें भावों में से कहीं भी स्थित हो और इस भाव को पाप ग्रह देख रहे हों|
(ग) बुध ग्रह अस्त हो, नीच राशि में हो, छठे या बारहवें भाव में बैठकर पाप ग्रहों द्वारा द्रष्ट हो|
(घ) बृहस्पति ग्रह नीच राशि में, अस्त हो, छठे भाव या आठवें भावों में कहीं भी हो| साथ ही पाप ग्रहों द्वारा द्रष्ट हो|
(ङ) तृतीय भाव का स्वामी ग्रह अस्त हो अथवा तृतीयेश छठे, आठवें अथवा बारहवें भावों में से कहीं भी स्थित हो|
इस प्रकार उपर्युक्त वर्णित बिन्दुओं की अधिकता से कुण्डली वाले जातक को प्रतिदिन प्रात: स्नानोपरान्त पूर्व दिशा की ओर मुँह करके आसन पर बैठकर ही तुलसी की माला द्वारा १०८ बार निम्नलिखित मन्त्र का जप करना चाहिए|
‘ॐ ऐं वाग्देव्यै च विद्महे कामराजाय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात्‌॥
सन्दर्भ :
1. ज्योतिष रत्नाकर, देवकीनन्दन सिंह, पृष्ठ 239
2. फलदीपिका, भावार्थ बोधिनी, गोपेश कुमार ओझा, पृष्ठ 37-38